बाबू किस्मत पर रोवे , टाटी से झाके लुगाई के
मेरी कलम से…
अखिलानंद यादव
धरती ना मिले कबहु नभ से
ऊहे हाल बा बाबू माई के
भईल दुश्मन भाई – भाई के…..
सर्दी में सांस फूले एईसन ,
तावा पर जईसन रोटी हो।
कर्जा काढ़ बियहले बाबू ,
घर में रहल जे बेटी हो।।
फुटल कौड़ी ना बा लगवा
जे आवे काम दवाई के…..
भईल दुश्मन भाई – भाई के ..
बस देखत में दूध उज्जर ,
करिया परभाव देखावत बा ।
दुख- दर्द जेके बाटे के रहल,
उहे त घाव लगावत बा ।।
खून के रिश्ता खून भईल ,
मउगी पाछे परछाई के ….
भईल दुश्मन भाई – भाई के….
बाबू के लाठी साटल बा ,
धोती हर जगह से फाटल बा ।
दू दिन से कुछउ ना खईले ,
बड़का लईका जे डाटल बा ।।
गिरे लोरवा कबहू कोरवा में
सुनावे जे लोरी गाई के….
भईल दुश्मन भाई – भाई के…
जब हित मित बटुरा जाले ,
बखरा के बात सुना जाले ।
माई – बाबू से केहू पूछे ना ,
दुनो भाई अगरा जाले ।।
एक बाबू के बहिया पकड़े
केहू पास बुलावत माई के …
भईल दुश्मन भाई – भाई के…
जब अलग -अलग अलगा जाले,
एक दूसरे के समझा जाले ।
कोई जाई ना इधर- उधर ,
मेहर से डाट चढ़ा जाले ।।
बाबू किस्मत पर रोवे
“टाटी से झांके लुगाई के….”
भईल दुश्मन भाई – भाई के।
जब “आनंद” आईल दुनिया में,
बाबू भिजत धावे बुनिया में ।
दिन आछर- गुछर में बीते,
सोहर सब गावे धुनिया में ।।
ना माने केहू ना जाने
“अखिल” आफत बनी बुढ़ाई के….
भईल दुश्मन भाई – भाई के….

