जरा याद करो कुर्बानी

आजादी का 75 साल नेहरू से लेकर मोदी तक

( ओमा The अक्© )

(भारत की आज़ादी के पचहत्तर वर्ष होने पर एक झलक लिए स्मृतिपत्र)


“भारत कोई राष्ट्र नहीं वह बहुत से देशों का समूह है… यदि हम अंग्रेजो ने भारत को आज़ाद किया तो वह कुछ ही समय मे बिखर कर नष्ट हो जाएगा..!”- चर्चिल (1947)

ओमा The अक्©

कांग्रेस के 1945 के अधिवेशन में जब मौलाना अबुलकलाम आज़ाद ने गाँधी के ‘नीरस वक्तव्य’ के पश्चात उनसे पूछा कि क्या अब आप जाना चाहेंगे?… बस उसी पल भारत की राजनीति में गाँधी युग का पटाक्षेप दिखने लगा था।

सरदार पटेल के “बेडरूम” में बन्द भारत-पाकिस्तान के दोनों-नुमाइंदे बंटवारे के कागज़ात बना रहे थे… हर चीज़ 80-20 के अनुपात में बंट गए थी… केवल 2 चीजों को छोड़ कर जिनमे एक था पागलखाना जिसे दोनों ही लेने को तैयार नहीं थे… इस लिए उसे दोनों में लावारिस छोड़ दिया… दूसरी चीज थी “एक स्वर्ण-बग्घी” जिसे दोनों चाहते थे… पर तोड़ कर उसे नही ले सकते थे इस लिए फैसला “टॉस” पर रखा गया… सिक्का हवा में उछला और सनसनाता हुआ ज़मीन पर लौटा… टॉस हो गया… भारत ने पाकिस्तान को उसके जन्म से पहले ही हरा दिया…!

जिन्ना “औरंगजेब रोड” देहली में बने अपने बंगले को खाली कर के निकल गए थे… “पालम हवाईअड्डा” पहुँच कर विशेष-हवाई जहाज में सवार होते हुए उन्होंने अंतिम बार देहली को देखा और अपने सचिव से अजीब-स्वरों में कहा- “मुझे यक़ीन नहीं होता कि पाकिस्तान बन चुका है मेरे जीते जी..!”

ज्योतिषी नहीं चाहते थे कि देश पन्द्रह अगस्त को जन्म(आज़ादी) ले… यह “कालसर्प योग” का समय था… भारत को बहुत से भय सताते… लेकिन अंततः पन्द्रह अगस्त को 00:00 (मध्यरात्रि) का समय ही आज़ादी के लिए चुना नेहरू-मंत्रिमंडल ने… नेहरू आधे नास्तिक थे क्यों कि उनके पिता पूरे नास्तिक थे… जबकि माँ बहुत आस्तिक… इस लिए नेहरू ने अपनी रात बारह बजे अपने ऐतिहासिक भाषण में “नियति” को सन्दर्भ बना कर देश को जगाया… यूनियन-जैक लालकिले से उतर गया… तिरंगा आसमान में लहरा उठा…!

देश मे आज़ादी की लहर दौड़ पड़ी… “दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे/ रंग जीवन मे नया लायो रे../”.. ऐसे गीत हिंदी-सिनेमा के माध्यम से देश भर के दिल मे धड़क रहे थे… नेहरू के हाथ मे सफ़ैद कबूतर थे… पंचशील के सिद्धांत थे… प्रगतिशील सोच थी… नेहरू नए भारत का ही नही नए संसार का स्वप्न देख रहे थे…!

देश मे विभाजन की आग भड़क उठी थी पूर्व में बंगाल के दंगे तो गाँधी ने रोक लिए थे परन्तु उत्तर में पंजाब जल उठा…पग्गड़-टोपी की पहचान सर से बढ़ कर हो गई थी… साठ-हजार अंग्रेजी-फौज लाखो के क़त्ल को नही रोक सकी… रेल के रेल भर कर लाशें उतरने लगीं… रज़िया की इज़्ज़त अशोक ने लूटी तो अहिल्या का बलात्कारी रहमान निकला.. स्त्रियां अपने देह की बंधक बन कर पिसती मरती रहीं बिना यह बोले कि “हमारा एक ही धर्म है–स्त्री धर्म!”

पटेल ने अपनी शक्ति और सूझ से सारे भारत को एक ही संविधान की ओर झुका लिया था… केवल कश्मीर अपनी आजादी के घमंड में धोखा खा रहा था… पाकिस्तान उसे निगलने बढ़ चुका था… कश्मीर के राजा हरिसिंह ने नेहरू से मदद माँगी… नेहरू ने मदद की क़ीमत पर कश्मीर को भारत का अंग बना लिया… भारत का मुकुट भारत के माथे पे आ सजा… पाकिस्तान को पैदा होते ही भारत से दूसरी हार मिली…!

ठंड की उस सुबह “बिड़ला-हाउस” में एक मराठी-ब्राह्मण नौजवान शांत-भाव से टहल रहा था.. उसे इतिहास बदल देने की इच्छा थी… आज उसे एक “पाखंडी का वध” करना था… वह पाखंडी जो “एकता की बात करते हुए अन्याय का पक्षधर था”… जो पाखंडी केवल स्वयम को देवता सिद्ध करना चाहता था चाहे इस के लिए कितनो की बलि चढ़ जाए…. यह नवयुवक जानता था कि इसका परिणाम “एक नही अनेक मृत्युदण्ड” हैं… फिर भी उसने आगे बढ़ कर उस “दुष्टात्मा” के पाँव छुए जो सारे भारत के लिए “महात्मा” था… उसने सर उठाते ही अपनी “अंग्रेजी-रिवॉल्वर” से उसके सीने में गोलियां दाग दी जिसे संसार मोहनदास करमचंद गाँधी और “बापू” कह कर बुलाता था… हाड़मांस का वह पुतला धरती पर ढह गया और साथ ही ढह गया वह भारत जो ‘गांवों में बसने वाला’ था… 30 जनवरी की उस सुबह गाँधी अपने देश मे मर गया… और गोडसे गाँधी के देश की न्यायालय में खड़ा हो गया…!

पण्डित नेहरू के हाथों के कबूतर दगाबाज-चीन ने उड़ा दिए… नेहरू टूट गए… लता मंगेश्कर के गाये गीत “जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुर्बानी”… सुनते सुनते नेहरू की आंखों से आँसू टपकने लगे…. नेहरू बीमार पड़ गए और चीन के बाद बीमारी से भी जंग हार गए…. उनकी राख पूरे भारत मे बिखेर दी गयी…!

पाकिस्तान को लगा कि भारत कमज़ोर देश है… इसे हराया जा सकता है… पाकिस्तान ने भारत पर चढ़ाई कर दी… बनारस का छोटे-कद और बड़े चरित्र वाला कायस्थ प्रधानमंत्री अपने पूरे तेवर से गरज उठा – “जय जवान- जय किसान”… और भारत की सेना ने कुचल दिया पाकिस्तान… ये उसकी तीसरी हार थी… कुटिल “सोवियत संघ” ने हस्तक्षेप किया… ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री को बुलाया गया… शास्त्री ने भारी मन से समझौता किया और सोने चले गए… वो सो गए… और कभी नही उठे…. उनकी मौत उसकी नींद की तरह ही रहस्यमयी हो गयी…!

जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा अब गूंगी गुड़िया नहीं रह गयी थी… उसने श्वेत क्रांति- हरित क्रांति और औद्योगिक क्रान्ति करते हुए देश को समृद्ध और समर्थ बनाने लगी… लेकिन साथ ही साथ देश में भ्र्ष्टाचार/कला बाजारी/ घूसखोरी ने जड़ जमा लिया… उधर सीमा पार पाकिस्तान के पंजाबी मुस्लिमो ने पूर्वी बंगाल में “शरीयत” के नाम पर कहर बरपा किया था… लाखो स्त्रियों की अजमत तार तार कर दी गई… लाखो बेगुनाहों को बेमौत मार दिया गया… तब इंदिरा ने भारतीय जवानों को मदद के लिए आगे भेजा जिन्होंने चौथी बार विजय पाते हुए पाकिस्तान को चीर के दो-टुकड़े कर दिया…. एक नया राष्ट्र बना बंगला देश जी टैगोर की कविता को अपना राष्ट्रगान बनाए भारत और इंदिरा गाँधी को नमन कर रहा था…!

“देश को अनुशासन की आवश्यकता है..!”…. सुबह सुबह भारत की आँख खुलते ही “इंदिरा इज़ इंडिया” के नारे से विभूषित नई-नई भारत रत्न श्रीमती गाँधी के इस संवाद में छुपी थी “लोकतंत्र पर बन्दी” की नाजायज घोषणा… 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने की अवधि में भारत के भीतर आपातकाल घोषित था… तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने दबंग प्रधानमंत्री इन्दिरा की इच्छा पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी… इस घोषणा के बाद देश मे राजनैतिक भूचाल आ गया… ‘सरकार का विरोध ही राष्ट्र का विरोध’ बन गया… इंदिरा की आलोचना ही “राष्ट्र द्रोह” हो गई… लोग जेल में ठुसे जाने लगे… कइयों की जान का कोई पता न चला… सब कुछ “नौकरशाही” के हाथ मे था… न्यायालय बस घर की पंचायत बन कर रह गया… सविंधान जलने लगा… भीड़ सुलगने लगी… और एक दिन “जयप्रकाश” के नेतृत्व में “दिनकर” की पंक्ति राष्ट्रीय उद्घोष बन गई– “सिंघासन खाली करो कि जनता आती है..!”

मोरारजी देसाई भारत की पहली मिलीजुली “जनतापार्टी-सरकार” के प्रधानमंत्री बन चुके थे… इंदिरा जेल से लौट कर नई योजनाओं में जुट गईं थी… शुरुआत “अखबार मालिकों” से सबन्ध बढ़ाने से हुई… फिर बारी आई “चौधरी चरण सिंह” को नए स्वप्न दिखाने की… स्वप्न फले… मोरारजी की सरकार गिर गयी… कांग्रेस के समर्थन से कभी नेहरू की “कृषि विरोधी नीतियों के विरुद्ध कांग्रेस छोड़ने वाले किसान नेता चरण सिंह कुछ समय के प्रधानमंत्री बन गए… इधर अखबार देश को समझा रहे थे कि देश मे ‘इंदिरा निर्विकल्प’ हैं… लोग धीरे-धीरे आपातकाल भूलने लगे…और इंदिरा दोबारा दिल्ली की रानी बन गई..!

अमृतसर के पवित्र स्वर्णमंदिर परिसर में इंदिरा के आदेश पर “ऑपरेशन ब्लूस्टार” हुआ… सिख-आतंकी “भिंडरावाले” और उसकी सेना का सफाया करने के लिए यह निर्णय लिया गया… परिसर तो खाली हो गया… किन्तु चरमपंथी सिक्ख इंदिरा से घृणा करने लगे… और 31 ओक्टुबर 1984 को बेअंत सिंह और सतवंत सिंह नाम के प्रधानमंत्री के दो अंगरक्षको ने अपनी ही नेता को गोलियों से भून डाला… इंदिरा गाँधी की लाश चिता में गिरी… और पूरा देश सिक्खों के लिए शमशान सा बन गया… दंगे भड़कते रहे… और सरकार चुप रहीं..!

राजीव गाँधी एक “जेंटलमैन” थे… उन्हें राजनीति नहीं आती थी… वह स्वप्नदर्शी थे… इसी कारण उन्हें बोफोर्स घोटाले से ले कर सरकार गिरने की त्रासदी एक साथ झेलनी पड़ी… भारत को इकसवी सदी में ले जाने का ख़ाब देखने वाला यह युवा नेता स्वयम इकस्सीवीं सदी आने से एक दशक पहले ही आज़ाद भारत के पहले “आत्मघाती दस्ते” का शिकार हो गया…सच मे 21 मई की वह रात पूरे भारत को रुला गयी…!

नब्बे के दशक का अंतिम भाग सच मे राजनैतिक रूप बहुत अस्थिरता भरा था… चुनाव-अल्पमत-समर्थन और समर्थन वापसी भारत मे रोज़ का खेल हो चुका था 4 साल में 4 प्रधानमंत्री देखने का अवसर अजीब था देश के लिए… विश्वनाथ प्रसाद सिंह को “मंडल आयोग” निगल गया… चंद्रशेखर सिंह की “निर्धनता”…. गुजराल अपने शराफत में गद्दी से उतर गए तो देवगौड़ा कूटनीति का शिकार हो गए… इस तरह गणपति को दूध पिलाने वाले एक बड़े तांत्रिक “चंद्रास्वामी” की मदद से चन्द्र शेखर और देवगौड़ा के अतिरिक्त भारत के आर्थिक मोर्चे पर सबसे सफल प्रधानमंत्रीयों में एक “पी वी नरसिम्हा राव” सत्ता में आए… मनमोहन सिंह की अर्थनीति ने भारत को बदलना शुरू कर दिया… देश को अब “थम्सप” की जगह “पेप्सी-कोला” पसन्द आने लगा था… दूरदर्शन की जगह “स्टार टीवी” और “एम टीवी” भा रहे थे… भारत तेज़ी से पश्चिम के प्रेम में डूब रहा था… इधर राम-मंदिर की रथयात्रा निकालते आडवाणी और अटल देश मे हिंदुओं के नए भाव गढ़ रहे थे… दंगे-फसाद एक आम बात हो चुकी थी… हिन्दू-मुस्लिम ने घृणा बढ़ने लगी थी… “वामपंथी विचारधारा” अब “चरम दक्षिण पंथ” को अपरोक्ष मदद करने लगी थीं… देश सामाजिक रूप से अस्थिर हो रहा था… 6 दिसंबर 1992 की शाम को बाबरी मस्ज़िद गिरा दी गई… और इसके कुछ दिन बाद बम्बई में पहला “इस्लामिक आतंकवाद” दर्ज हुआ बमविस्फोट के रूप में… उफ़्फ़! मज़हब का खूनी चेहरा कितना भयंकर होता है..!

नरसिम्हा राव अपने गुरु चंद्रास्वामी के साथ जेल की ओर मुड़ गए… हवाला-कांड और हर्षद मेहता हास्य कवियों की नई पसन्द थे… लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती, राबड़ी देवी ये सब नए नेताओ के नाम थे… यह लोकतंत्र के नए चेहरे थे जो “शिष्ट राजनीति” के सर्वथा विरुद्ध थे… इनकी राजनीति जातिवाद और सम्प्रदाय के आसपास थी… यद्यपि इसमें भी समाजवादी सोच का एक अंग तो था ही… लेकिन भाजपा के उत्थान के साथ ही देश मे साम्प्रदयिक-राजनीति बहुत बलवान होने लगी… राव के पश्चात नेहरू-शैली किन्तु नेहरू के विचार के धुर विरोधी “अटल बिहारी वाजपेयी” प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने और पांच साल स्थापित रहने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने… भारत-पाकिस्तान के मध्य “समझौता एक्सप्रेस” चलाने से शुरुआत करने वाले वाजपेयी की सरकार का अंत “करगिल-युद्ध” में पाकिस्तान को पाँचवी पराजय देने के साथ हुआ… लेकिन इसके मध्य कंधार कांड और संसद पर आतंकी हमला हुआ… देश तेज़ी से बदलने लगा…!

इक्कीसवीं सदी का स्वप्न देखने वाले राजीव गाँधी की इटैलियन-पत्नी सोनिया गाँधी को देश की जनता ने इकस्सीवीं-सदी के भारत की बागडोर थमा दी परन्तु इर्ष्यालु और स्वार्थी नेताओं के विरोध के चलते सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री की गद्दी न लेने का अद्भुत और साहसिक निर्णय ले कर देश को चकित कर दिया… और अपनी ही सास की हत्या करने वाले सिक्ख समुदाय के “मनमोहन सिंह” को देश का प्रधानमंत्री बना दिया… यह दो निर्णय अगले एक दशक तक उन्हें सत्ता में बनाए रखने में सफल हुआ… देश को इतिहास की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मिली… देश मे पैसा बरसने लगा… साथ ही साथ होने लगे बड़े बड़े घोटाले… टू-जी घोटाला/ कॉमनवेल्थ घोटाला और भी कई… मग़र देश की आर्थिक समृद्धि बढ़ती ही गयी… और तब आया ‘गुलाबी-आंदोलन-युग’…!

गाँधी को अपना आदर्श मानने वाले “अन्ना हज़ारे” ने “लोकपाल” और “कालेधन” पर देश मे पुकार लगाई… करोणों लोगों का समर्थन अन्ना की ओर बढ़ा… देहली के जंतर-मंतर पर नए भारत की तस्वीर गढ़ी जाने लगी… सत्ता मद में चूर यूपीए सरकार को लगा ये सब यूँ ही है… किन्तु बात इसके उलट थी… देश ने नए विकल्प ढूढने शुरू कर दिए… दिल्ली में “केजरीवाल” और देश मे “नरेंद्र मोदी” विकल्प बन कर सामने आए…!

“अबकी बार मोदी सरकार”…. देश के बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर आ गया… लोगों को “अच्छे दिन” की उम्मीद थी… ये अच्छे दिन वो थे जिनमें देश “एक देश एक टैक्स” देने वाला था… पेट्रोल सत्तर रुपए से गिर कर 35 रुपए लीटर हो रहा था… देश भर के लोगो के अकॉउंट में पन्द्रह-पन्द्रह लाख रुपए आ रहे थे… देश में लोकपाल आ रहा था… राम मंदिर बन रहा था… कश्मीर मुक्त हो रहा था… देश मे “सबका साथ सबका विकास” हो रहा था… अब इनमें क्या हुआ क्या नहीं यह खोजना तो नही पड़ेगा… नोट बन्दी हुई लोग तबाह हुए… जी एस टी ने व्यापार की कमर तोड़ दी… राम मंदिर निर्माण की राह खुली…कश्मीर से धारा 370 हटाई गई… कॅरोना काल गरीब का काल बना… किसानों का आंदोलन चल रहा… साम्प्रदयिक-वैमस्यता बढ़ती जा रही… टैक्स बढ़ते ही गए… मंहगाई बढ़ती जा रही… सेंसरशिप बढ़ती जा रही… मन की बात अधिक काम की कम… पर जो कुछ भी हो देश का मीडिया अब भी राजनैतिक-निर्विकल्पता की दुहाई दिए जा रहा है…!

आज देश के अनेक “लघु उद्योग” बन्द हो गए… मध्यमवर्गीय समाज निम्नवर्गीय होता गया है… लोग व्यापार को तरस रहे… अमेज़ॉन और नेटफ्लिक्स अमीर हो रहे… मल्टीनेशनल-युग आ चुका है… देश तेज़ी से “समाजवादी से पूंजीवादी” हो चुका है… यह सब बदलाव एक दिन के नही है… यह पचहत्तर साल के बदलाव हैं…. देश पर कई बार विपत्ति आयी है पर भारत बार बार चर्चिल को मुँह चिढ़ा कर आगे बढ़ा और आज अपने जन्म के पचहत्तर साल पूरे कर लिए… बहुत से स्वप्न और असमंजस से घिरा यह देश आज भी अपने लोकतंत्र में लोकमान्य तिलक के उस स्वप्न के चरितार्थ होने की प्रतीक्षा कर रहा है जिसमे उन्होंने कहा था- “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे ले के रहेंगे…!”

आज पचहत्तर साल के लोकतांत्रिक भारत ने चर्चिल की एक भविष्यवाणी तो झुठला दी है परन्तु चर्चिल ने भारत को स्वतंत्रता मिलने से ठीक पाँच महीने पहले ब्रिटेन की संसद में जो कहा था वो अब तक गूंज रहा है… चर्चिल ने सदन में कहा — “भारत को स्वतंत्र किया तो भारत की सत्ता दुष्टों, बदमाशो और लुटेरो के हाथो में चली जाएगी… भारत के सभी नेता ओछी क्षमता वाले और भूसा किस्म के व्यक्ति होंगे…उनकी ज़बान मीठी होगी लेकिन दिल निकम्मे होंगे…वे सत्ता के लिए एक दुसरे से लड़ेंगे और इन राजनितिक झड़पों में एकदिन भारत का अंत हो जाएगा… एक दिन आएगा जब भारत में हवा और पानी पर भी टैक्स लगा दिया जाएगा…!”

15 अगस्त 2021

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