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19 साल से बिछुड़ा बेटा लॉक डाउन में पिता से मिला, बेटे के इंतजार में पथरा गई थीं बूढ़े मां-बाप की आंखें

(आनन्द कुमार)

प्रयागराज। यह लॉक डाउन भले ही लोगों को अपने अपने घरों में ठहरा दे लेकिन इस लॉक डाउन के बीच 19 साल पहले बिछड़ा किसी मां और बाप के कलेजे का टुकड़ा अगर मिल जाए तो उसके खुशियों का ठिकाना क्या होगा, कल्पना मात्र से सोच कर खुशियों में सराबोर कर देगा।

जिस बेटे की तलाश में परिजन 19 साल तक एक-एक दिन और रात दुखों की करोड़ों के साथ काटे हों, अपने बेटे को खोजने के लिए दर-दर की ठोकरें खाये हों और ऐसे में कोई देवी देवता व देवस्थल पूजने को बाकी ना रहा हो और जब यह सब करने के बाद 19 साल बाद लॉक डाउन में मां-बाप की मुलाकात अपने बेटे से हो जाए तो क्या कहना। फिर तो बस यही कि मां बाप के खुशियों का ठिकाना क्या होगा, उस बेटे को अपने मां और पिता से मिलने का खुशी क्या होगा आसानी से सोचा जा सकता है। वैसे तो दर्द के समंदर में जब खुशियों का गोता लगता है तो वह कितना हसीन और प्रेम भरा होता है, उसके प्रति शब्द नहीं होते और यह कोई न फिल्मी कहानी है और ना ही पटकथा, यह गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन का केंद्र प्रयागराज की सच्ची घटना है जो इस समय गली-गली में ही नहीं पूरे देश में चर्चा का विषय है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लाइब्रेरियन के पद से रिटायर अवधेश मिश्रा प्रयागराज जनपद मुख्यालय के चैथम लाइन स्थित राम प्रिया रोड पर आवास बनाकर रहते हैं। 19 साल पहले उनका 6 साल का बेटा आकाश एक दिन घर से खेलने के लिए निकला तो लौटा नहीं काफी खोजबीन किया गया और लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला। रात भर खोजबीन करने के बाद अगले दिन थाने में गुमशुदगी भी दर्ज कराई, थाने का चक्कर भी वर्षो तक लगाता रहा पर कोई फायदा नहीं हुआ। तलाश करते करते हफ्ते, महीने और फिर 19 साल बीत गए।

बेटे के गम में उसकी मां की हालत भी खराब होने लगी, वह उसके आने आने की आस सदैव संजोए रही तथा भगवान के आगे नतमस्तक होकर नित्य प्रार्थना करती थी। धीरे-धीरे 19 साल बीतने के बाद भी हम लोगों ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी और शायद ईश्वर से प्रार्थना का ही देन है कि आज 19 साल बाद मेरा बेटा मुझे मिल सका है। पहले तो एक बार भी अपने आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, अवधेश बताते हैं कि पड़ोस में रहने वाले विंध्यवासिनी तिवारी मंफोर्डगंज निवासी एक इंजीनियर के साथ काम करते हैं। इंजीनियर का मकान उसी जगह है, जहां उनके बेटे आकाश को अपना बेटा होने का दावा करने वाले विनोद अग्रहरि का परिवार रहता है। किस्मत का खेल देखिए, विंध्यवासिनी का वहां आते जाते बेटे आकाश से संपर्क हो गया। एक दिन डांट डपट के बाद वह दिनभर भूखा रहा। मिलने पर विंध्यवासिनी ने कारण पूछा तो उसने कहा कि असली मां-बाप होते तो शायद कभी भूखा ना रहने देते।

फिर क्या था बेटे की उतनी बात पड़ोसी को कुछ अटपटी लगी।। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए जब उससे पूछा तो उसने बताया कि छह साल की उम्र में ही वह अपने मां-बाप से बिछड़ गया था। वह अपना घर ठीक से तो नहीं बताया लेकिन जिस प्रकार से लोकेशन बताया वह अवधेश मिश्रा के मकान से मेल खाने लगा। विंध्यवासिनी के बताने पर एक दिन आकाश खुद घर पहुंच गया। जिसे देखकर एकबारगी तो उन्हं अपनी आंखों पर भी विश्वास नहीं हुआ। लेकिन फिर कपड़े, चोट के निशान और बचपन की तस्वीरें आदि दिखाने पर यकीन हो गया कि वह हमारा ही बेटा है।

19 साल पहले बेटा बिछड़ा हो और उसी शहर में रहता हो, ना बेटे को खबर लगी और ना बाप को और ना ही उस बेटे को पाल रहे उस बाप को जो बेटे को उसके असली बाप तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ना समझी कि वह किसी की अमानत में खयानत क्यों कर रहा है, और 19 साल बाद जब बिछड़ा बेटा मिलेगा तो खुशियां और दर्द सराबोर और वह कर जिस प्रेम को प्रस्फुटित करेगा उसे आसानी से सोचा जा सकता है।

अवधेश ने बताया कि इन 19 सालों में ज्यादातर वक्त उनके बेटे को बाहर ही रखा गया। शुरुआत के कुछ सालों में उसे सुल्तानपुर भेज दिया गया था। इसके बाद शहर लाया गया लेकिन आठवीं तक पढ़ाई कराने के बाद ही उसे काम के सिलसिले में बाहर के शहरों में भेजा जाने लगा। उनका दावा है कि यह बातें खुद बेटे आकाश ने उन्हें बताई हैं। वह यह भी कहते हैं कि आकाश उनके तीन बेटों में सबसे छोटा है। दो बड़े बेटों में एक दिल्ली स्थित प्राइवेट कंपनी जबकि, दूसरा हाईकोर्ट में अधिवक्ता है। अगर आकाश उनके पास होता, तो क्या ऐसा हो सकता था कि महज आठवीं के बाद उसकी पढ़ाई बंद करा दी जाती। पिता अवधेश कहते हैं, जो भी इसके लिए दोषी हो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस इस मामले की पूरी जांच करे। 19 सालों तक उनके जिगर के टुकड़े को अपना बेटा बता कर पास रखने वालों की पूरी जांच हो। उनसे पूछा जाए कि किसी दूसरे व्यक्ति के बच्चे को उन्होंने अपने पास किसकी अनुमति से रखा और इसकी जानकारी पुलिस प्रशासन को क्यों नहीं दी।

ऐसे में 19 साल तक जो बेटा अपने मां बाप से बिछड़ा हो और जो मां-बाप 19 साल तक अपने कलेजे के टुकड़े से दूर रहे हो सब पर क्या बीती होगी इसे आप आसानी से सोच सकते हैं और ऐसे में वह व्यक्ति जो मात्र 6 साल के बच्चे को पाने के बाद अपने घर रख लिया और उसने यह पता लगाने की जिम्मेदारी नहीं समझी कि आखिर इस बच्चे का असल मां बाप कौन है उसने पुलिस को सूचना देने की जिम्मेदारी नहीं समझी कहीं न कहीं वह भी इस मामले में जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है। जब 19 साल बाद कलेजे के टुकड़े का मिलन किसी बूढ़ी मां बाप जो अब भी उम्मीद लगाए थे, उनके सामने वह वह 6 साल का बच्चा 25 साल के जवान के रूप में आकर खड़ा हो तो सहसा उन आंखों की चमक क्या होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। लाक डाउन में यह मिलन अपने आप में इतिहास को समेटकर बस यही कहेगा की लॉक डाउन जिसके लिए अभिशाप होगा अभिशाप होगा लेकिन अवधेश के परिवार के लिए तो प्यार, मिलन संजो कर ले आया।

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