हालात ए मीडिया : पत्रकार या चाटुकार ?
(क़ाएम मेहदी)
दिल्ली। ऐसे शब्द देश में विगत दिनों में बहुत सुनने में आ रहें हैं कि आज पत्रकार का नया पर्यावाची शब्द चाटुकार है। प्रतिदिन देश में पत्रकारों के चरित्र को लेकर सवाल उठ रहे हैं। परन्तु अगर हम इस सच की गहराईयों तक पहुंचे तो तस्वीर कुछ और ही देखने को मिलती है। वर्तमान समय में देश का लगभग 74% युवा सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर इत्यादि) से जुड़ा हुआ है और दुनिया का कोई भी व्यक्ति इस बात से अछूता नही है कि आज के समय में सोशल मीडिया द्वारा एक समय में कोई भी व्यक्ति हजारों लोगों से संचार एवं अपने विचारों को उनके समक्ष रख सकता है। आज दुनिया का हर छठा युवा सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में सोशल मीडिया से जुड़ा हर चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी न किसी रुप में प्रयोग करता हैं। जिनमें से अधिकतर लोग इसका इस्तेमाल पत्रकारिता के क्षेत्र में पत्रकार के रुप में भी कर रहे हैं और वर्तमान समय में सोशल मीडिया तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक माध्यम बन चुका है। जिसके द्वारा लोग अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। आज देश में सोशल मीडिया द्वारा चल रही पत्रकारिता को ही लोगों ने सच मान लिया है जबकि आंकड़े देखें जायें तो सोशल मीडिया पर 80% व्यक्ति किसी न किसी विचारधारा को लेकर एवं किसी भी विशेष जाति, धर्म, समुदाय या राजनीतिक पार्टी के पक्षधर होकर ही एक पत्रकार की भूमिका निभा रहे हैं। जबकि एक पत्रकार की परिभाषा इन सबसे बिल्कुल ही अलग है। देश में आये दिन सोशल मीडिया द्वारा फर्जी खबरो, फोटो एवं विडियो वायरल हो जाने के कारण दंगे भङकते रहते हैं। जबकि इन सब का ठिकरा भी जनता पत्रकारों पर फोङती है। आपने वो कहावत तो सुनी होगी कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है। देश की आम जनता तो इस तथ्यों से अंजान रहती है कि ऐसी खबरें या विडियो वायरल करने वाले लोग मान्यता प्राप्त पत्रकार नही होते। देश में बहुत से दंगे हुए हैं जिसका कारण सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल हुई फर्जी खबरें, फोटो एवं विडियो ही हैं। 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे का मुख्य कारण सोशल मीडिया ही जिसमें दो लोगों के मारने का पुराना विडियो दिखाया गया जिसके कारण दंगा भङक गया और चार दर्जन से भी अधिक मौतें हुई। पिछले वर्ष बंगाल में किसी बांग्लादेशी फिल्म के सीन को इस तरह से सोशल मीडिया पर दिखाया गया कि वह बंगाल में हो रही है जिससे सांप्रदायिक दंगे भङक उठे। जिससे लोगों के मन में पत्रकारों के लिए गलत संदेश पहुंचता है और जनता उन्हें चाटुकार जैसे शब्दों से पुकारती है।
सोशल मीडिया द्वारा आजकल चुनाव प्रचार-प्रसार भी बहुत ज़ोरों से किया जा रहा है। फेसबुक द्वारा किसी पेज का निर्माण करके अपनी राजनीतिक पार्टियों की सकारात्मक छवियों को ही पेश किया जाता है।और एक आंकड़ों के अनुसार लोकसभा की 160 सीटों पर सोशल मीडिया का दबदबा है और यहीं पर ही राजनीतिक जंगों के अखाड़े भी सजते हैं। जबकि इन सब का भी ठिकरा जनता पत्रकारों के ऊपर ही फोङती है।
आज भारत में पत्रकार एक विपक्ष की भूमिका अदा कर रहा है और इतिहास भी इसका गवाह है कि पत्रकारों ने समय समय पर इसकी मिसाल पेश की है चाहे वो बात सन् 1975 के आपातकाल के दौरान जेपी आंदोलन की हो या हाल ही में मारे गये पत्रकारों की हो जिसमें शांतनु भौमिक,गौरी लंकेश या फिर संदीप शर्मा जैस पत्रकार शामिल हैं। इन्होंने अपनी जान न्यौछावर कर दी परन्तु अपने ज़मीर का सौदा कभी नही किया। पत्रकारों पर हमले तो आय दिन हुआ करते हैं परंतु इन सब के पश्चात भी वो निडरता पूर्वक सच्चाई को जनता के समक्ष रखते हैं। और कुछ सोशल मीडिया के लोगों के कारण आज सारे पत्रकार कलंकित हो रहे हैं। यह एक कटु सच्चाई है कि लोगों को पत्रकारों से खबर तो चाहिए लेकिन कभी कोई उनकी खबर नहीं पूछता।
“तू पत्रकार से खबर तो लेता है,लेकिन उसकी खबर नही लेता”
लेखक-
दिल्ली स्कूल आॅफ जर्नलिज्म, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।

