रचनाकार

शब्द मसीहा केदारनाथ की कहानी : मेरी जान

(शब्द मसीहा केदारनाथ)

“अरे! सुनती हो ।” पति ने कमरे में से ज़ोर से पुकारा ।

“बहरी नहीं हुई हूँ और भुलक्कड़ भी नहीं । सुबह मुझे क्या-क्या कह रहे थे, सब याद है ।” पत्नी ने भी आते ही कहा ।

“तुम्हारे ये गीत सुनते हुए रिटायर हो गया , लेकिन ये तुम्हारा रिकर्ड प्लेयर न जाने किस कंपनी का बना है , जब देखो तब अपना ही राग सुनाएगा ।” पति ने ताना मारा ।

“कोसते-कोसते बाल पक गए मुझे, लेकिन तुम्हारी भी कांव-कांव करने की आदत नहीं गई । तुम्हारी माँ ही आई थी रिकार्ड प्लेयर पसंद करने ….ये मत भूलो तुम ।” पत्नी ने कहा ।

“मालूम है सब । खुद से तो कुछ कहा न जाता था , सहेली के हाथ रुमाल भिजवाया , खत भिजवाया …संदेशा देना याद नहीं क्या ?” पति भी गुर्राया ।

“गलती हो गई मुझसे ।” पत्नी ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा ।

“वो तो मुझसे भी हो गई गलती । इस्तहार के चक्कर में पड़ गया …माल को जांचा परखा नहीं । न जाने किस से ख़त लिखवाकर भेजा था । तुमसे छोटी को देखो आज भी खुद को मेंटेन किए है। ” पति ने कहा।

“वही तो …..मर्द कितना भी बूढ़ा हो जाय , लेकिन नज़र औरतों पे ही रहती है । दो शादी-शुदा बच्चों की माँ है वो । और उसके घरवाले को देखा है कभी , हाथों-हाथों में रखता है उसे । और एक तुम हो कि … ।” पत्नी कहते हुए रुक गई।

“हाँ हाँ कह दो कि मेरी छाती पे मूंग दलने के लिए ज़िंदा बैठे हो । मर भी गया तो इस उम्र में कोई भाव नहीं देगा तुम्हें। देख रहा हूँ आजकल बहुत नारिवाद चढ़ रहा है तुम्हारे खोपड़े पर ।” पति ने भी ज़ोर देकर कहा था ।

“मुझसे फिर बात ही क्यों करते हो ? सुबह ही कहा था न ….मुझसे बात करने की जरूरत नहीं ।” पत्नी ने कहा ।

“कौन बात करना चाहता है तुमसे । वो तो चश्मा नहीं मिल रहा था सो आवाज़ लगा दी । जाओ चश्मा देकर, और खड़ी रहो बालकनी में …. मैं भी देखता हूँ कौन माई का लाल तुम्हें छेड़ता है!” पति ने गुर्राते हुए कहा ।

पत्नी उसके पास आई और सिर से चश्मा उतारकर हाथों में दे दिया और बोली-

“ये लो । कुछ याद नहीं रहता । बेकार में तंग करने की आदत हो गई है।”

पति ने हाथ पकड़ा और बोला – “पगली चश्मा तो बहाना था । तुम्हें पास बुलाना था । इस बुढ़ापे में तुम रूठ गईं तो मेरे सिवा किसने मनाना था। बाहर जा रहा हूँ । दाँत तंग कर रहा है । रसमलाई लाऊं या रबड़ी खाओगी ?” पति ने चश्मा आँखों पर चढ़ाते हुए कहा ।

“रुको मैं भी चलती हूँ ।”

“दाँत दिखाने जा रहा हूँ, डॉक्टरनी पसंद करने नहीं । मुँह से तो कह दो जो खाना है , नहीं तो फिर कहोगी कि ख्याल नहीं रखता ।” पति ने अपनी छड़ी उठाते हुए कहा ।

“तो क्या तुम्हें ये भी भूल गया कि मुझे क्या पसंद है ?” पत्नी ने उलाहना दिया ।

“वो कैसे भूल सकता हूँ , जब से आई हो कलेजा ही खा रही हो । ले आऊँगा जो लाना होगा ।” पति बोला ।

“जल्दी लौट आना । इधर -उधर बात करते मत रह जाना । कुछ-कुछ होने लगता है मन को ।”

“कुछ भी हो ….पर प्यार के दो बोल तो जुबान पर आएंगे नहीं ।” पति ने जूते पहनते हुए कहा ।

“अब क्या आई लव यू सुनना चाहते हो मुझसे ? जाओ नहीं कहती ।” पत्नी ने इठलाते हुए कहा ।

“सच्ची बात मुँह से निकल ही जाती है । मैं भी नहीं कहूँगा आई लव यू …सुन लो ।” पति ने बाहर निकलते हुए ज़ोर से कहा ।

“हाँ हाँ सुन लिया ….अब क्या सारे मोहल्ले को सुनाओगे ? शर्म नहीं आती ?” पत्नी ने दरवाजा बंद करते हुए कहा ।

“तुमसे नहीं आती शर्म …..औलाद से आती है । साले अकेले छोड़ जाते हैं आपस में लड़ने के लिए । सौ बार कहूँगा ….आई लव यू ….आई लव यू ।” पति बड़बड़ाता हुआ अपनी छड़ी का सहारा लेकर रिक्शे में बैठ गया और रिक्शेवाले से बोला -“पहले मिठाई की दुकान पर ले चलो , बाद में दाँत के डॉक्टर के पास । भूल गया तो नाराज हो जाएगी मेरी जान ।”

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