शब्द मसीहा का लद्यु कथा- कन्या है तू…
“अरे! बिलंदिया ठीक से पोछा मार दे . आज घर में देवी की पूजा शुरू होगी . तेरी अम्मा तो अपवित्र हो गई . देवी से धोखा नहीं करना चाहिए और कामचोरी भी नहीं . हर कोना साफ़ और पवित्र होना चाहिए .” मालकिन कामवाली की बेटी से बोली .
“जी, मालकिन ! सब अच्छे से कर दूँगी पर मेरी माँ अपवित्र कैसे हो गई ?” बिलंदिया ने पूछा .
“अभी तू छोटी है . जब तू गन्दी होगी तब पता चलेगा . चल काम कर और बिलंदिया है तो बिलंदिया ही रह ….हा हा हा .”
वह घर की सफाई करती रही . काम खत्म हुआ तो वह मालकिन के पास आकर बोली – “मालकिन ! कल मेरा स्कूल है , मैं नहीं आ सकूंगी . अम्मा ने आपसे कहने को कहा है !”
“अरे! कैसी कामचोर है तू , स्कूल का बहाना नहीं चलेगा , तनख्वाह काट लूँगी . तू कौन-सी लाट साहब बनेगी . पढ़ती तो सरकारी स्कूल में है !”
“मालकिन ! अम्मा कहती है स्कूल छोटा बड़ा नहीं होता . हम शिक्षा से ही छोटे बड़े होते हैं .” बिलंदिया बोली .
“माँ ! इसकी पढ़ाई खराब होगी . मेरी तो अभी छुट्टी है . हम पूजा खुद करते हैं तो सफाई खुद क्यों नहीं कर सकते ? कुछ ही दिन की तो बात है !” नीता बोली .
“चुप रह तू और अपनी पढ़ाई कर . इस् बार अगर तेरे नंबर कम आये तो झाड़ू पोछा ही करना उम्रभर.”
“अगर देवी माँ हमारी हैं तो बिलंदिया की भी तो माँ हैं . क्या देवी माँ को ये अच्छा लगेगा कि उनकी बेटी बिना पढ़े रहे ?” नीता बोली .
मनोरमा को बुरा तो लगा कि उसे काम करना पडेगा पर देवी का नाम सुनते ही वह चुप सी हो गई और बिलंदिया से बोली –
“बिलंदिया ! तीन चार दिन की बात है , फिर तो तेरी माँ आ ही जायेगी . अगर तू रोज आयेगी तो प्रसाद और दस रुपये रोज दूँगी तुझे . कन्या है तू …तेरा हक थोड़े ही मारूँगी !”
बिलंदिया मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाकर चली गई .
शब्द मसीहा

