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यह किसकी शवयात्रा है…

(अरविन्द कुमार सिंह)
आजमगढ़। यह हमारे समय और सिस्टम की शवयात्रा है या धरती के भगवान की?यह हमारी मर चुकी मानवीय संवेदना की शवयात्रा है या पथरा चुकी करूणा की। यह हमारी चिकित्सा सेवा की शवयात्रा है या दिनों रात अट्टालिकाओं पर अट्टालिकाए खडी़ करने वाली अतृप्त क्षुधा की?यह हमारे समय की शवयात्रा है या वासना के हद तक संचय करने वाली धन संस्कृति की ?
आखिर ‘प्रयास’ और ‘युवा मंच’ के चार कंधों पर आजमगढ की सड़कों पर उठी यह शव-यात्रा किसकी है?
लाशों के सौदागर शिशिर जायसवाल की या उसकी अतृप्त वासना की? या आजमगढ़ चिकित्सा सेवा के प्रतीक की । या खतरनाक चुप्पी साध लिए आईएमए और उनके जवाबदेह पदाधिकारियों की। यह जनपद की कानून व्यवस्था,चिकित्सा व्यवस्था और प्रशासनिक अपंगता की शवयात्रा है, या रीढ़ विहीन हो चुके खद्दरधारियों के दृष्टिदोषों की।
आखिर इस करूण रूदन के साथ एक जिंदा चिकित्सक का पिंड़दान और अंतिम संस्कार करने वाली इस सोच के भीतर क्या है। ‘राम राम सत्य है और शिशिर की यही गति है’ के पीछे का मनोविग्यान क्या।
दरअसल यह जन आक्रोश है जो अलग अलग माध्यमों और तरीकों से अभिव्यक्त हो रहा है। यह आक्रोश वेदांता हास्पिटल और उसके प्रबंधन के खिलाफ है।यह आक्रोश लाशों के सौदागर के खिलाफ सड़कों पर फूट रहा है। यह आक्रोश चिकित्सा सेवा के डकैतों के खिलाफ फूट रहा है।यह आक्रोश पुलिस की नपुंसता और प्रशासनिक व्यवस्था के लाचारी के खिलाफ है।यह आक्रोश राजनीति के अवसरवादिय़ों और उनके निकम्मेपन के खिलाफ है। यह जड़वत हो चुकी इंसानी सोच के खिलाफ है।यह आक्रोश उस नपुंसक मौन के खिलाफ है जो संवेदनहीनता के चरम तक पहुँच चुकी है। यह आक्रोश उस जवानी के खिलाफ है जिसका इतने के बाद भी खून नहीं खौला।यह आक्रोश उस कलम के खिलाफ है जिसके स्याही से सच नहीं निकल रहा है।यह आक्रोश उस मीडिया के खिलाफ है जो मंडी में पहुँच चुकी है। अगर इसे शांत करना है तो इनके सवालों का जवाब देना होगा।वेदांता के खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी होगी।

(लेखक- शार्प रिपोर्टर मैगजीन व मनमीत मैगजीन के सम्पादक हैं)

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