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मुझे इन भाई साहब की चुगली करनी है!

रोज़ दोपहर घर का कोना-कोना गुनगुनी धूप में सुस्ता रहा होता है..पूरे घर में सिर्फ दो ही हरकतें हो रही होती हैं; हर वक्त चलने वाली हवा से बालकनी में हिलता झूला और लैपटॉप पर दौड़ती मेरी उंगलियां..। तभी ठक! ठक! ठक! की आवाज़ पूरे घर की तंद्रा को भंग कर देती है..। महाशय पता नहीं कहां से खिड़की में प्रकट होते हैं…और लगते हैं चोंच मारने..। नाचीज़ के ग़रीबखाने का विन्यास कुछ ऐसा है कि एक आहट भी पहली से तीसरी मंज़िल तक गूंजती है..। पहले-पहल तो आवाज़ के रहस्य को सुलझाने के लिए नीचे से ऊपर तक के कई चक्कर लगाने पड़े..फिर पता चला ये सेंधमारी मेरे ही कमरे में हो रही है..।

और हिम्मत है कि बढ़ती ही जा रही है..। पहले शीशे के दूसरी ओर आदमी देखकर ये भाग खड़े होते थे (सॉरी, उड़ खड़े होते थे!)..लेकिन अब उसका भी लिहाज़ नहीं रहा..। हमने तो अंदर इनकी गर्लफ्रेंड भी किडनैप करके नहीं रखी है..।

अगर भाई साहब की चोंच मारने की यही शिद्दत रही तो जल्द ही शीशे पर बन आएगी..। शीशा तो चलो शीशा है, भीतर और भी कितनी कीमतें चीज़ें हैं… मेरे दिल जैसी! मैंने तो आपकी भाभी को बोल दिया है, दोपहर के वक्त किसी और कमरे में बैठा करे..। और नहीं तो..!

खुद भाई, इन कजरारे नयनों और इतने प्यारे चटख़ रंगों में सजकर आ जाते हैं और यहां हम लॉकडाउन में लालूजी के हमशक्ल होते जा रहे हैं! (हालांकि मैंने कई लड़कियों के मुखारबिंद से उनके लिए भी “हाउ क्यूट” निकलते देखा है!)

किसे पता जब मैं लैपटॉप, फोन, व्हाट्स ऐप में डूबा होता हूं, श्रीमती जी को देखकर खिड़की पर गीत-वीत भी छेड़ देते हों..। अब यहां इतने प्रकार के बहुरंगी पक्षी चहचहाते रहते हैं कि पकड़ना करना मुश्किल है..। कई बार तो दफ़्तर की कांफ्रेंस कॉल्स में पूछा जा चुका है- क्या कोरोना के डर से पेड़ पर जा बसे हो? और अपनी काकवाणी का तो वॉयस ओवर भी मुश्किल से पास होता रहा है..। मैं कई बार अपनी ही सिफारिश कर चुका हूं तो कि अगर कभी किसी जलसे, ऑडिटोरियम में लोग ओवर-फ्लो हो जाएं तो मेरी सेवा शर्तिया गारंटी के साथ ली जा सकती है..। और ये छलिया ठहरा इंडियन आइडल के फाइनल राउंड वालों की टक्कर का गवैया..। मैं कहां से मुकाबला करूंगा..।

आपको दिल की बात बताऊं; ईर्ष्या मुझे ये भी है कि आपके इस पंछी को तो देर-सबेर फैक्ट्रियों के धुएं से बदरंग आसमान में लौट जाना है, लेकिन ये यहीं रहेगा, अपने और असंख्य रंग-बिरंगे साथियों के बीच, मेरी हकीकत पर अपने उन्मुक्त वजूद की चोंच मारता हुआ..।

अब एलओसी की तरह बाड़ और माइन्स तो बिछाने से रहा, ड्रोन उड़ने में इसकी बराबरी कर नहीं पाएगा..लेकिन इसे शूट करने का इरादा मेरा भी पक्का है..।

लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद पहला मौका मिलते ही एक शानदार डीएसएलआर या मिररलेस कैमरा खरीदूंगा..और अपने भाई Rajesh Joshi से ट्रेनिंग लूंगा..। फिर देखता हूं बच्चू बचकर कहां जाता है?

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