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पूरक आहार के साथ दो वर्ष तक स्तनपान बेहद जरूरी

मऊ। बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के तहत जिले में पोषण पखवाड़ा चलाया जा रहा है। पखवाड़े में समुदाय को छः माह के हो चुके शिशुओं को खीर व हलवा खिलाकर धात्री महिलाओं को पूरक पोषाहार के साथ-साथ स्तनपान के विषय पर जानकारी दी जा रही है। पूरक आहार का उद्देश्य मां के दूध की सम्पूर्ति करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि शिशु को पर्याप्त ऊर्जा,प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्व प्राप्त होते रहें, जिससे कि वह सामान्य रूप से विकसित हो सके।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सतीशचन्द्र सिंह ने बताया कि नवजात के जन्म के प्रथम वर्ष के दौरान शिशु की विकास दर सर्वाधिक होती है और बच्चे की पौषणिक स्थिति निर्धारित करने में शिशु आहार पद्धति उसमें स्तनपान एवं पूरक आहार भी शामिल है। नियमित आहार के पूरक के लिए किया जाता है। आहार पूरक विटामिन, खनिज, अमीनो एसिड, प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट का एक स्रोत है जो नियमित आहार में अनुपस्थित हो सकता है। ताकत, मस्तिष्क, सुंदरता में सुधार, त्वचा, बाल और नाखून के स्वास्थ्य में सुधार, कब्ज, दर्द और एनीमिया को दूर करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
डॉ सतीशचन्द्र सिंह ने बताया कि संतुलित आहार वह है जो आपके बच्चे के शरीर को सही तरीके से काम करने के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। सप्लीमेंट्स टैबलेट, पिल्स, लिक्विड और कैप्सूल के रूप में सप्लीमेंट्स में विटामिन डी और ई, जड़ी-बूटियाँ, प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन आदि भी दिये जाते हैं।
जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) दुर्गेश कुमार ने बताया कि छः माह तक शिशु का वजन लगभग दो गुना बढ़ जाता है एवं एक वर्ष पूरा होने तक वजन लगभग तीन गुना एवं लंबाई जन्म से लगभग डेढ़ गुना बढ़ जाती है। इसके लिए अतिरिक्त पोषक आहार की जरूरत होती है। इसलिए छः माह के बाद शिशुओं के लिए स्तनपान के साथ पूरक आहार देना जरुरी है। बच्चों को पूरक आहार में छः माह से आठ माह के बच्चों के लिए नरम दाल, दलिया, दाल-चावल, दाल में रोटी मसलकर अर्ध ठोस (चम्मच से गिराने पर सरके, बहे नही), खूब मसल कर साग एवं फल प्रतिदिन दो बार दो से तीन भरे हुए चम्मच से देना चाहिए। ऐसे ही नौ माह से ग्यारह माह तक के बच्चों को प्रतिदिन तीन से चार बार एवं बारह माह से दो वर्ष की अवधि में घर का पका पूरा खाना एवं धुले एवं कटे फल को प्रतिदिन भोजन एवं नाश्ते में देना चाहिए।ौौ

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