पीला धागा…
“आज जरा अपनी दरियादिली पे कंट्रोल ही रखना . मालूम है तुम्हारी प्यारी बहिन आ रही है . राम जाने कितना बड़ा गड्ढा है इसका जो भरता ही नहीं है, कितना भी दे दो .” पत्नी कुडकुडाते हुए बोली .
“हाँ, मालूम है और वो कुछ नहीं जो तुम तीन दिन से कर रही हो ? बच्चों के कपड़े भाई के लिए , भाभी के लिए . घंटाभर लाइन में लगकर मिठाई लाया तुम्हारे भाई के लिए . अरे! इकलौती बहिन है मेरी , कम से कम उसे भी खुश रहने का हक है .”
“तो मैंने कब मना किया है . आजकल तो बराबर का हिस्सा है भाई बहिन का . दे दो उसे ये मकान भी और ले आओ हमें रोड़ पर . तुम्हारी ये अच्छाइयां दुश्मन बन गईं हैं मेरे चैन की .”
“सही कह रही हो तुम . आजकल आदमी की अच्छाई से ज्यादा तकलीफ होती है .”
“तुमसे तो बात करना ही बेकार है . मैं अपने भाई का टीका करने जा रही हूँ और हाँ , उसके काम की हालत ठीक नहीं है . मैंने एक लाख ले लिए हैं अलमारी से जब हो जायेंगे वापिस दे देगा.”
“ठीक है , इन्हें मिलाकर सात लाख हो गये , मगर आज तक उसके मुँह से कभी वापसी का नाम नहीं सुना . इस बार अपने भाई से अपना हिस्सा मांगकर देखना , प्यार का अहसास हो जाएगा.”
“मुझे बहुत विश्वास है अपने भाई पर . लाखों में एक है .” और वह गाड़ी में बैठ बाहर निकल गई .
कुछ देर बाद उसकी बहिन ऑटो से उतरी और उसके गले लगी .
“भाभी कहाँ है भैया ? बच्चे नहीं दिखाई दे रहे कहीं !” वह बैग से सामान निकालते हुए बोली .
“दो तीन घंटे तक आ जायेगी . राखी बाँधने गई है अपने भाई को .”
“भैया ! आज तुम्हें अपने हाथ से कुछ बनाकर खिला देती हूँ . बताओ क्या खाओगे ?”
“अरे! रहने दे तू . पहले राखी बांध फिर कुछ बाहर से मँगवा लेंगे .”
“समझ गई मैं . मैं सत्तू अपने साथ लाई हूँ . तुम्हारे लिए सत्तू के परांठे बनाती हूँ और आलू की तरकारी . साथ ही खायेंगे . मैंने भी कुछ नहीं खाया .” और उसने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए रसोई में प्रवेश किया . भाई सोफे पर बैठा अखबार पढ़ने लगा .
कुछ देर बाद पसीने से तर बहिन ने भाई के सामने सत्तू के परांठे और तरकारी रख दी .
“तुम खाओ भैया ! मैं तब तक चाय बना देती हूँ . मुझे मालूम है तुम खाने के बाद अजवायन वाली चाय पीते हो .” और वह फिर वापिस हो गई . भाई परांठों और तरकारी को देखता रहा मगर निबाला मुँह में न गया . थोड़ी देर बाद बहिन चाय लेकर आ गई .
“ये क्या ? तुमने परांठे ठन्डे कर दिये . कुछ खा के राखी बाँधने का अपना ही मजा है …हा हा हा .”
“तुझे मालूम तो है , जब तक तू नहीं आती मैं कुछ खाता नहीं हूँ . चल पहले राखी बाँध .” और भाई ने अपनी कलाई आगे कर दी .
पीला धागा उसने हाथ में बाँध तिलक किया और मिठाई खिलाई . दोनों एक दूसरे को देखते रहे .
“अरे! अब कुछ खा भी ले . ऐसे क्या देखता रहता है तू मुझे . मैं वही बहिन हूँ तेरी जिसकी तू चोटी खींचता था …हा हा हा .”
तभी दरवाजे पर कार रुकने की आवाज आई .
“भैया ! लगता है भाभी आ गई . मैं देखती हूँ .”वह उठकर दरवाजा खोलने चली गई . दरवाजा खुलते ही भाभी रोती हुई अपने कमरे में घुस गई . पीछे-पीछे भाई भी चला गया .
“क्या हुआ ? इतनी जल्दी वापिस क्यों आ गईं और रो क्यों रही हो ?”
“तुम सही कहते थे . मैंने मजाक में ही भाई से कह दिया कि मुझे भी घर में हिस्सा चाहिए और उसने जो किया वो मैं सोच भी नहीं सकती थी . मेरे भाई को मेरी भाभी ने कब्जे में कर लिया है . अब मैं कभी नहीं जाउंगी . मेरा रिश्ता खत्म आज से .” पत्नी बोली .
“मुँह हाथ धोकर तुरंत बाहर आ जाओ . मेरा खाना इंतज़ार कर रहा है . उसके बाद बहिन को छोड़ने भी जाना है स्टेशन तक .” और वह बाहर निकल गया .
खाने की टेबल पर बहिन भाई इंतज़ार में बैठे थे .
“माफ करना दीदी ! मैं जरा गुस्से में थी . पर हम चाहते हैं कि तुम अपना हिस्सा ले लो मकान में . इस घर पे तुम्हारा भी हक है .”
“क्या बात कर रही हैं आप भाभी ! मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा ऐसा . मैं जैसी भी हूँ खुश हूँ . भैया का प्यार और स्नेह ही मेरे लिए बहुत है . इस बार हमारे यहाँ फसल बहुत अच्छी हुई है . गाँव से घी-तेल और दाल भी लाई हूँ . भैया को सत्तू के परांठे बहुत पसन्द हैं सो मैंने बना दिये . मुझे तो मेरे भैया की ख़ुशी चाहिए . मकान तो मेरा भी बहुत बड़ा है . क्या करुँगी मकान और पैसों का ? मुझे बस सकून चाहिए .”
भाभी पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया था . उसने परांठा तोड़ा और भाई के मुँह की तरफ बढ़ा दिया . पति के हाथ का पीला धागा प्यार से मजबूत था उनके .
शब्द मसीहा


अति सुंदर