“पंछी”
( किशोर कुमार धनावत )
उस पंछी को,
जब भी देखता हूँ,
मन प्रसन्न।
चोंच उठाये,
आंखें टिमटिमाता,
फिर झुकाता।
हवा जो चली,
डाली हिलने लगी,
पंख फैलाया।
खुला गगन,
उड़ चला मस्ती में,
मैं खड़ा रहा।
सोचने लगा,
काश पंछी होता तो,
मुक्त रहता।
चारदीवारी,
बन जाती पिंजरा,
घिर जाता हूँ।
वक्त की चाल,
महामारी पसरी,
फैलायी टांग।
अब क्या करुं,
निकलना बंद है,
सबकी मांग।
( २७-४-२०२१ )

