जाना तेरा यूं ऐसा था… जैसे की कटे ‘पतंग’ कोई
जाना तेरा यूं ऐसा था
जैसे की कटे पतंग कोई
मेरे हाथों में ही है, डोर तेरी
पर साथ तेरा अब होगा नहीं
चलना था सफर में जब साथ-साथ
फिर तेरा यूं बिछड़ना ठीक नहीं…
तय की थी हमने कितनी दूरी
पर तेरा यूं गुजरना मंजूर नहीं
छूना था गगन का हर कोना
पर तुझको यूं खोना कुबूल नहीं
अब जाती हो तो,
जाओ फिर
तेरा रूकना भी,
अब ठीक नहीं
मेरा क्या है, मैं हूं भी अगर
तो बिन तेरे,
मैं हूं भी नहीं…
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