रचनाकार

जरूरतमंदो के मसले पर अब कौन लिखेगा, सोचके यह जरूरतें बुनियादी लिखनी पड़ती हैं

( बृजेश )

उम्मीद लिखनी थी नाशादी लिखनी पड़ती है,
तरक्की की जगह बरबादी लिखनी पड़ती है ।
गुलामी की जंजीरों ने हमें अब भी जकड़े रखा है,
झूठ बोलना पड़ता है आजादी लिखनी पड़ती है ।
सच की तहरीरों पर अब पाबंदियों का दौर है,
हुक्मरानों के डर से बात आधी लिखनी पड़ती है ।
जरूरतमंदो के मसले पर अब कौन लिखेगा,
सोचके यह जरूरतें बुनियादी लिखनी पड़ती हैं।

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