ऐतिहासिक सोनाडीह मेले की तैयारी अंतिम दौर में, चैत्र नवरात्रि से पूर्णिमा तक चलता है मेला
● मान्यता है कि मां से मांगी मन्नते अवश्य होती हैं पूरी
(अशोक जायसवाल)
बिल्थरारोड/ बलिया। 25 मार्च को रामनवमी के दिन से लगने वाले सोनाडीह के ऐतिहासिक मेले की तैयारियां शुरू हैं। चैत्र रामनवमी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलने वाले इस मेले का पौराणिक महत्व है। मान्यता है कि जब क्षेत्र में राक्षसों का आतंक बढ़ गया तो मां चामुण्डा ने इनका संहार करने के बाद इसी स्थान पर विश्राम की थी। यह स्थान विजय स्थल के रूप् में भी प्रसिद्ध है। मां के यहां विश्राम करने से यह क्षेत्र पवित्र हो गया। संसारिक कष्टों से पीड़ित मनुष्य जब यहां मां भागेश्वरी व परमेश्वरी का दर्शन पूजन करता है तो उन्हें इसका लाभ अवश्य मिलता है। श्रद्धालुओं के संसारिक कष्टों से मुक्ति पाने व मन्नतें मांगने के लिए यहां अधिकाधिक संख्या में पहुंचने से यहां मेला का माहौल बन गया जो कालान्तर में एक वृहद मेले के रूप में परिवर्तित हो गया। मान्यता है कि शक्तिपीठ में शुमार सोडीह मंदिर में पूजा-अर्चना करने वालों की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।
सोनाडीह का इतिहास…
मान्यता है कि क्षेत्र में रक्तबीज राक्षस व उनके दूत हाहा व हूहूं का काफी आतंक था। इस दौरान हाहा व हूहूं राक्षसों ने मां चामुण्डा से शादी का प्रस्ताव रखा। मां चामुण्डा ने उनके प्रस्ताव पर सूर्योदय तक घाघरा नदी के बहाव को मोड़कर सोनाडीह तक ले आने की शर्त रखी। शर्त को पूरा करने के लिए दोनों राक्षस रात भर घाघरा नदी की खुदाई करते रहे। परन्तु सूर्योदय तक उनका कार्य पूरा नही हो सका। हार से खीजकर दोनो राक्षसों ने मां को युद्ध के लिए ललकारा। मां चामुण्डा ने युद्ध के दौरान उनका संहार कर दिया। मंदिर के उत्तर दिशा में आधा किमी दूर हाहानाला को इसी से जोड़ कर देखा जाता है। उधर अपने दूतों के बध की खबर सुनते ही रक्तबीज आग बबूला हो गया तथा मां से बदला लेने पहुंच गया। मां चामुण्डा ने युद्ध के दौरान उसका भी वध कर दिया। गांव के दक्षिण-पश्चिम में मौजूद रतोई ताल को रक्तबीज से ही जुड़ा बताया जाता है। इसी प्रकार मंदिर के उत्तर दिशा में मौजूद मटूकाडीह गांव के बारे में किदवंती यह है कि मधु-कैटभ नामक राक्षस का वध मां ने इसी स्थान पर किया था। मंदिर के पूर्व दिशा से 2 किमी दूर स्थित चंद्रौल गांव को भी चामुडा असुर के संहार से जोड़ कर देखा जाता है वहीं गांव के दक्षिण तरफ मौजूद शुम्भा ताल मां द्वारा शुम्भ-निशुम्भ राक्षसों के वध की गवाही देता है। देवी स्थान से 2 किमी पूर्व-दक्षिण दिशा में स्थित भिण्ड-कुण्ड गांव यानि भैंसकुण्ड को महिषासुर के बध का स्थान माना जाता है। देवी स्थान से कुछ ही दूर स्थित चाड़ी गांव में चामुण्ड राक्षस का बध तथा दक्षिण दिशा में एक किमी दूर स्थित पुराना टीला बाणीकोट जो भगवानपुर में स्थित है को बाणासुर राक्षस के बध स्थल से जोड़कर देखा जाता है। मां द्वारा इस क्षेत्र से राक्षसों के संहार के बाद यहां विश्राम करने से यह क्षेत्र पवित्र हो गया। कालान्तर में यहां लगने वाला मेला सोनाडीह मेले के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

