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आरबीएसके के अंतर्गत रणवीर को मिली जिंदगी, गरीब माता-पिता के लाखों रुपये बचे

मऊ। जिले में संचालित आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) के अंतर्गत परदहा ब्लॉक की टीम द्वारा कुछ दिन पूर्व न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट से ग्रसित एक बच्चा रणवीर पाया गया। जनपद में पहली बार इस विकृति से ग्रसित कोई बच्चा पाया गया, जिसका हाल ही में झाँसी के मेडीकल कॉलेज में निःशुल्क सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया गया। रणवीर के सफल इलाज से उसका परिवार बहुत खुश है। अब रणवीर पूरी तरह से स्वस्थ है और अब वह अन्य स्वस्थ बच्चों की तरह अपनी ज़िन्दगी जी रहा है।

परदहा ब्लॉक के रणवीरपुर ग्राम पंचायत के रहने वाले अशोक कुमार सूर्या के सात वर्षीय बेटे रणवीर प्रताप को जन्म से ही एक गंभीर विकृति से ग्रसित था। आरबीएसके परदहा की टीम एक स्कूल में जाँच के लिए पहुंची तो टीम ने स्कूल के सभी बच्चों जाँच की। जाँच के दौरान उनमें से रणवीर प्रताप की रिपोर्ट में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट नामक गंभीर विकृति देखी गयी। उसके बाद टीम ने 29 नवम्बर 2018 को जिला अस्पताल में उसकी पूरी जांच की गयी, जिसके बाद उसे झाँसी के रानी लक्ष्मीबाई मेडीकल कॉलेज के लिये रेफर किया गया। मेडीकल कॉलेज की टीम ने भर्ती करने के कुछ दिनों के बाद 27 दिसंबर को रणवीर का सफल ऑपरेशन किया। वहीं मेडीकल कॉलेज के डॉक्टरों की देख रेख में डिस्चार्ज होने के बाद, अब वह अपने गाँव की मिट्टी में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत निःशुल्क प्रबंधन के जरिए जन्मकाल से लेकर 18 वर्ष की आयु वाले बच्चों के लिए 38 प्रकार के चयनित स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान की जाती है। इसके अंतर्गत 4 डी यानि जन्मजात दोष, कमियां, बाल्यावस्था से जुडी बीमारियों तथा विकासात्मक विलंब के कारण बच्चे की असमय मृत्यु को कम करने एवं सामान्य जीवन जीने हेतु राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम का सञ्चालन किया जा रहा है जिससे शिशु मृत्यु दर में कमी लायी जा सके साथ ही कार्यक्रम की गुणवत्ता में सुधार कर अधिक से अधिक लोगो को लाभान्वित किया जा सके।

रणवीर को खोजने वाली टीम में डॉ. मधु राय, स्टाफ़ नर्स जाहिदा बेगम, पैरामेडीकल स्टाफ़ रोली सिंह शामिल रहे| टीम के ग्रुप लीडर डॉ. राहुल गुप्ता ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान महिला को फोलिक एसिड खाने से बच्चों को इस जन्मजात रोग नहीं हो, तथा इससे पूर्व से बचाया जा सकता है। यह बीमारी रीड की हड्डी के उपर गाँठ की तरह हो जाती है जिसके बाद में बढ़ते-बढ़ते भयावह रूप ले लेती है। वहीँ विकलाँगता से बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। इस विकृति का इलाज आम आदमी खर्च से परे है। इसका इलाज़ प्रदेश में आरबीएसके के अंतर्गत सिर्फ दो जगह पर होता है पहला लखनऊ का पीजीआई और दूसरा झाँसी के रानी लक्ष्मीबाई मेडीकल कॉलेज में।

आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ एम लाल के निर्देशन में कार्यरत डीईआईसी मैनेजर अरविन्द वर्मा अपने टीम की इस सफ़लता से बेहद खुश हैं उन्होंने बताया कि मेडीकल कालेज पहुँचने के बाद मरीज के साथ एक परिजन के रहने एवं गंभीर विकृति के इलाज और दवा से लेकर खाने पीने तक की पूरा खर्च सरकार इस कार्यक्रम के अंतर्गत उठाती है। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए जिले में कुल 9 ब्लॉक में 18 टीमें लगी हुयी हैं। यह टीमें सभी ब्लॉक के सरकारी स्कूलों वर्ष में एक बार एवं आंगनबाड़ी में वर्ष में दो बार विजिट कर स्क्रीनिंग करती हैं| वहीँ जन्मजात विकृति से ग्रसित मिलने पर इलाज के लिए जिला चिकित्सालय और गंभीर विकृति की स्थिति में रेफर के लिए बड़े सरकारी अस्पतालों अथवा मेडिकल कालेज में भेजा जाता है।

न्यूरल ट्यूब डेफेक्ट क्या है…
यह दिमाग, स्पाइनल कॉर्ड और रीढ़ की हड्डी की जन्मजात विकृति है। यह तब दिखता हैं जब दिमाग और रीढ़ की हड्डी में ऐसा विकार बन जाए कि यह पूर्ण रूप से बंद होने में विफल हो जाए। न्यूरल ट्यूब डेफेक्ट गर्भावस्था के पहले 5 हफ्तों में ही हो जाता है। तथा यह बहुत गंभीर जन्मजात रोग है। अगर इसके इलाज की शुरुआत बच्चे के जन्म के 24 घंटे के अंदर न हो तो बच्चे की मृत्यु भी हो सकती है। अगर बच्चे को इलाज़ मिला तो वह बच सकता है। अगर बच्चे का सही समय पर इलाज़ न हुआ और तब भी जान बच गई तो वह विभिन्न प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता का शिकार हो सकता है।
न्यूरल ट्यूब डेफेक्ट कैसे पहचानें?
1- ढूँढे सूजन (गांठ) कहाँ हैं। ज़्यादातर वह सिर या पीठ पर होगी।
2- उभार का रंग, आकार देखना चाहिए।
3- ढूँढे कि सूजन से कोई स्राव/रक्तश्राव तो नहीं हो रहा।
4- देखे कि बच्चे के पैर ठीक से काम करते हैं या नहीं।
5- यह भी देखे कि उसको पखाना हो रहा हैं या नहीं।

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