रचनाकार

हमीं ने,नफ़रतों के दाँव सब,उस को सिखाए थे वो हम पे चलता, उल्टा दाँव, तो,अफ़सोस अब कैसा

@ डॉक्टर वसीमुद्दीन जमाली

हमीं ने गाँव में, शहरों के सपने ला के बेचे थे
नहीं, पहले सा अपना गाँव, तो, अफसोस अब कैसा ।

जब हम ने पेड़ राहों के किनारे,सारे ख़ुद काटे
नहीं, सुस्ताने को है छाँव, तो,अफ़सोस अब कैसा ।

जड़ें, रिश्तों की अपनी, हम ने ख़ुद, हाथों से हैं ,काटी
ठहरने को नहीं है,ठांव, तो,अफसोस अब कैसा ।

जब हम ने, हंस के बदले में, एक कव्वे को पाला है
है करता ,सर पे ,कांव कांव, तो अफ़सोस, अब कैसा ।

हमीं ने,नफ़रतों के दाँव सब,उस को सिखाए थे
वो हम पे चलता, उल्टा दाँव, तो,अफ़सोस अब कैसा

शायर–डॉक्टर वसीमुद्दीन जमाली
अध्यक्ष प्रलेस, मऊ

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