सुबह सबेरे- शब्द मसीहा : खुद्दार औरत
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बहुत ही ग़मगीन माहौल था . उषा के घर के लोग और ससुराल के लोग बैठे हुए थे .
“देखिये! भाई साहब …अगर बुरा न मानें तो मैं उषा पर छोटे बेटे से चादर डलवा देता हूँ .” उषा के ससुर बोले .
उषा का तन मन चीत्कार कर उठा . वह मन ही मन सोचने लगी कि कैसी अजीब रीत है जो प्रीत को समझती ही नहीं . कल तक तो ये ही कहते थे कि भाभी माँ के सामान होती है. वह भी तो उसे भैया ही कहती है . फिर उसे मालूम भी है कि महेश शुभा से प्रेम करता है .
“जी , जवान लड़की है . अभी तो शुभम भी बहुत छोटा है . उसकी किस्मत ही खोटी है भाई साहब . हमने तो बेटी सौंप दी आपको . अब हम क्या कह सकते हैं .” उषा के पिता बोले .
उषा को भी अपने पिता की मजबूरी का अहसास था . दो और बहिनों को ब्याहना था उसे . छोटी सी नौकरी में किस तरह पेट काटकर उन सबको पालापोसा और पढ़ाया था इस बात को और पिटा की मजबूरी को वह खूब समझती थी .
“ये नहीं होगा जी . तीन साल में मेरा जवान बेटा खा गयी . इसको देखूँगी तो मुझे बार-बार उसकी याद आएगी . बच्चे में मेरे बेटे का अंश है मैं पाल लूंगी उसे . अपनी बेटी आप ले जाओ . इनका क्या है बेटे के मोह में पागल हो गए हैं .” उषा की सास बोली .
‘समधिन जी ! ऐसी कठोर बातें मत कीजिये . मेरे बेटी भी तो विधवा हुई है . वह बेटी जीवन भर की सजा काटेगी .” उषा के पिता ने हिचकिया लेते हुए कहा .
“रहने दीजिये आप सब लोग मेरी और मेरी औलाद की चिंता . आपने ब्याह दिया, अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली . आप बोझ मुक्त हुए . मैं कोई जानवर नहीं जिसका रस्सा किसी के भी हाथ पकड़ा दिया जाए . इतनी समर्थ मैं हूँ कि खुद को और उनकी निशानी को पाल सकूं . औरत हूँ कमजोर नहीं हूँ .”
“साहब ! ये वही बहादुर उषा है . रिक्शा चलाती है और बच्चा भी पालती है बिना किसी की मदद से . किसी का अहसान नहीं लेती . खुद्दार औरत है साहब . कई लोगों ने प्रस्ताव रखा शादी का और नौकरी का मगर वो कहती है उसे आजादी पसंद है .” उस रिक्शे वाली के बारे में पूछने पर मुझे बताया .
लेखक : शब्द मसीहा केदारनाथ दिल्ली में रेलवे विभाग में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं

