आंदोलन में संस्कार
@ राजेश कुमार सिंह…
युवा आंदोलनों के नाम पर,
उठी विरोध की आँधी है।
अपने ही आँगन में हमने,
देखी इसकी स्वघोषित कामयाबी है।
कुछ लोग यहाँ भी ऐसे हैं,
जो अपनी राह दिखाते हैं।
मानो दुनिया भर के लोगों को,
नई दिशा सिखलाते हैं।
शायद उनको भान नहीं,
परिणाम कहाँ तक जाता है।
अनुचित पथ पर चलने वाला,
मंज़िल कभी न पाता है।
जब फल मिलता कर्मों का,
तब भ्रम भी टूट ही जाता है।
भटकी हुई हर एक चाह,
संघर्षों में खो जाती है।।
संस्कार हमारी अमूल्य धरोहर,
यही हमारी सच्ची थाती है।
इसके पालन की जिम्मेदारी,
अब हम सबकी बारी है।
जब हम इसका मान बढ़ाते,
अपना गौरव भी बढ़ जाता।
साथ-साथ समाज और राष्ट्र का,
कल्याण स्वतः ही हो जाता।
जब युवा हो देश हमारा,
कर्तव्य भी उतने ही महान हों।
पथ से वह विचलित न हो,
न झूठे बहकावों का मेहमान हो।
संस्कारों से जो जुड़ा रहे,
वही राष्ट्र की पहचान है।
ऐसा युवा ही भारत माता का,
सच्चा गौरव, सच्चा अभिमान है।।
लोकतंत्र ने हम सबको,
वाणी की स्वतंत्रता दी है।
पर मर्यादा की सीमा रखना,
हम सबकी भी जिम्मेदारी है।
अधिकारों के साथ कर्तव्य निभें,
यही लोकतंत्र की शान है।
संस्कारों से सजा हुआ आचरण,
राष्ट्र का सबसे बड़ा सम्मान है।।
कुछ लोगों को देश की प्रगति,
कभी नहीं सुहाती है।
भारत आगे बढ़ता देख,
उनकी बेचैनी बढ़ जाती है।
बाधाएँ खड़ी करने वाले,
हर युग में मिल जाते हैं।
किन्तु दृढ़ संकल्पी राष्ट्र कभी,
रुकना नहीं जानते हैं।।
लोकतंत्र में विरोध करना,
स्वस्थ परंपरा मानी जाती है।
पर उसमें भी मर्यादा और संयम,
हमारी संस्कृति सिखलाती है।
बड़ों का सम्मान बना रहे,
अपना भी सम्मान बढ़े।
ऐसा आंदोलन ही समाज में,
विश्वास और परिवर्तन गढ़े।
आंदोलन की भी मर्यादा है,
अराजकता उसका रूप नहीं।
जहाँ अनुशासन साथ न हो,
वहाँ सम्मान का स्वरूप नहीं।
आंदोलन जैसा होता है,
वैसा ही इतिहास लिखता है।
उसके आचरण के आधार पर ही,
समाज निष्कर्ष निकालता है।।
प्रगति-विरोधी प्रवृत्तियों पर,
कभी न ढिलाई होने पाए।
भटके हुए हर व्यक्ति को,
मुख्य धारा से जोड़ते जाएँ।
संस्कार हमारी पूँजी हैं,
संस्कार हमारी थाती हैं।
इन्हीं के पालन से सशक्त,
राष्ट्र और पीढ़ियाँ बनती हैं।।


