पार्टी का सिंबल मिला, लेकिन वोट नहीं! परबतसर का एक वोट बड़े राजनीतिक सूरमाओं के लिए बड़ा सवाल
@आनन्द कुमार…
राजनीतिक दल अक्सर कहते हैं—“चेहरा मत देखिए, पार्टी देखिए। पार्टी जिसे सिंबल दे दे, उसके लिए संबल बन जाइए!” लेकिन नेताओं के मंचों से किए जाने वाले इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है राजस्थान निकाय चुनाव का एक नतीजा।
नागौर क्षेत्र की परबतसर नगर पालिका के वार्ड नंबर 13 का चुनाव परिणाम इन दिनों चर्चा में है और शायद बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं को इस पर थोड़ा सोचने-समझने की जरूरत है।
भाजपा ने यहां कैलाशचंद को प्रत्याशी बनाया, लेकिन उन्हें वोट मिला सिर्फ 01। दिलचस्प बात यह है कि कैलाशचंद खुद वार्ड नंबर 13 के मतदाता नहीं हैं, इसलिए मिला यह एक वोट उनका अपना भी नहीं था। मीडिया रिपोर्टों में उनके परिवार के सदस्यों द्वारा भी उन्हें वोट न देने की बात सामने आई है।
वहीं, कांग्रेस की हिना खानम ने 376 वोट हासिल कर चुनाव जीत लिया, जबकि निर्दलीय रशीद खान को 196 वोट मिले।
हालांकि, विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के कार्यकर्ताओं अथवा प्रत्याशी के परिजनों ने किसे वोट दिया, इसका आधिकारिक रूप से पता लगाना संभव नहीं है, क्योंकि मतदान पूरी तरह गोपनीय होता है।
लेकिन यही परिणाम एक बड़ा राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करता है—आप जिसे जनता के बीच प्रत्याशी बनाकर खड़ा कर देंगे, जरूरी नहीं कि जनता उसे स्वीकार भी कर ले।
वार्ड में कुल 573 वोट पड़े। इनमें एक वोट नोटा को गया और एक वोट भाजपा प्रत्याशी के खाते में आया। इसलिए यह खबर भले ही पहली नजर में हंसी-ठिठोली का विषय लगे, लेकिन इसका संदेश महज व्यंग्य तक सीमित नहीं है।
यह उस राजनीतिक प्रवृत्ति पर सवाल है, जिसमें कभी-कभी जनता की पसंद और स्थानीय स्वीकार्यता को समझे बिना किसी भी व्यक्ति को प्रत्याशी बना देने की होड़ दिखाई देती है।
अब राजनीतिक आका इस परिणाम को किस रूप में लेते हैं, यह उनकी मर्जी है। लेकिन अगर जनता वास्तव में इतनी जागरूक होकर प्रत्याशी के चयन पर भी अपनी राय व्यक्त कर रही है, तो यह बदलाव की राजनीति के लिए एक बेहतर संदेश हो सकता है और राजनीतिक दलों के लिए गंभीर माथापच्ची का विषय भी।
और हां, यह भाजपा के साथ हुआ है तो विपक्ष को सिर्फ खुश होने की जरूरत नहीं है। विपक्ष को भी इस एक वोट के परिणाम का अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि जनता की नाराजगी या असहमति किसी एक दल की स्थायी संपत्ति नहीं होती।
सवाल सिर्फ एक वोट का नहीं है—सवाल यह है कि जनता जिसे अपना प्रतिनिधि मानने को तैयार नहीं, क्या राजनीतिक दल उसे अपना प्रत्याशी बनाकर जनता पर थोप सकते हैं?

