सुबह सबेरे : धरती हमारी माता है
लद्यु कथा…
शब्द मसीहा (केदार नाथ)
कितना अच्छा वाक्य है यह . मगर किताबों में ही शोभा देता है . असल ज़िंदगी में मात्र श्लोकों में इसका उपयोग मस्का मरने के लिए किया जाता है भगवान को . भगवान भी वो ….. जिसे मानते तो सब हैं पर डरता कोई नहीं है . ठीक धरती माता की तरह या यूँ कहिये अपनी माँ की भी तरह . अम्मा कहना तो अच्छा लगता है पर हम में से कितने अम्मा की बात सुनते हैं ?
अमां भाई लोगो अपुन गलत तो कभी कहते भी नहीं हैं फिर आप पढ़ो या न पढ़ो . जब से हमें पता चला है कि हमारा बी पी तम्बाकू खाने से नहीं बल्कि थूकने से ज्यादा बढ़ता है हमने भी खैनी को टाटा बाय बाय कह दिया है . बहुत हो चुका अम्मा का दामन गन्दा करना . अब हम समझ गये हैं पर धक्का खाकर .
वो लोग जो सुबह सूरज के उगते ही हताह में लोटा लेकर निकल पड़ते हैं खुले में शौच के लिए . न जाने कब धक्का खायेंगे ? यारो ! धरती अगर माता है तो मान भी लो उसे माँ . कितने ही जंगल काट दिये हमने और उतार दी माँ के बदन से उसकी धोती . नंगा कर रहे हैं रोज धरती का बदन .
कहते हैं विकास कर रहे हैं . ख़ूब उद्योगों से निकला पानी …बिना त्रित किये नदियों में, नालों में बहा रहे हैं . क्या कर रहे हैं ? जानते हैं आपने धरती माँ की नशों में जहरीला जल भर दिया है . विश्वास नहीं तो गंगा और जमुना की हालत देख लीजिए. साँस लेने में धरती खाँसती है . हाँ, भाई हाँ …धरती को भी खाँसी हुई है . तभी तो आसमान अब नीला नहीं दिखाई देता . वो चाँद और सितारों से आसमान कब देखा था आपने ? अपने घर की छत पर जाकर खुद अपनी धुंधली होती आसमानी छत का जायजा लीजिए .
कंक्रीट के जंगल इस् तरह से पैदा हो रहे हैं कि धरती को डिहाइड्रेशन हो रहा है . हर सड़क पक्की, हर आँगन पक्का , कहीं से पानी धरती के हलक में नहीं जा सकता . ऐसे में धरती छटपटाए न तो क्या करे ? आप ने खुद ही भूकंपों को बुलाबा दिया है , भू स्खलनों को दावत दी है . रोम रोम में कंक्रीट भरते जा रहे हैं और इस् से आशंका पैदा हो गई है कि सामूहिक कब्रें आदमियों की बस्तियों की बन सकती हैं .
बदबू सिर्फ़ आपको ही नहीं आती . धरती को भी आती है …मगर आपने कूड़े के पहाड़ बना दिये हैं. कूड़े की समुचित व्यवस्था नहीं की उसका उपयोग और सही ट्रीटमेंट नहीं किया . ताल्बों को आप पी गये …बाबडीयाँ और कुए अब किताबों की या फिर फोटोज की बात रह गये हैं . नदियाँ सूख रही हैं …हिमालय पिघल रहा है …गरमी बढ़ रही है .
मगर आप सोचते रह जाते हैं कि आपको इस् से क्या मतलब? आप क्या कर सकते हैं ? धरती के लिए तो सबको ही मिलकर काम करने की जरुरत है . हर एक का योगदान जरुरी है .
प्लास्टिक थैलियों को न कहिये . लकडियों का विकल्प घर निर्माण में कीजिये . कागज़ का सही और न्यूनतम इस्तेमाल कीजिये , जलावन के लिए पेड़ों का काटना बंद कीजिये , तालाबों और पानी के अन्य श्रोतों को बचाइए. जितना हो सके, जहां भी हो सके जमीन पर पेड़ लगाइए .
इस् हांफती हुई जमीन की आवाज को सुनिए ….दरवाजा बंद करने वाला शौचालय चुनिए , पराली को बेच कर पैसा कमाइए, सोलर ऊर्जा को बढ़ावा दीजिए , लकडियों को जलाने की जगह गैस का उपयोग कीजिये , पानी को बचाइए , नदियों को गन्दा मत कीजिये और हाँ तम्बाकू से खुद को और परिवार को बचाइए . अपनी माँ , बच्चों की माँ को खुश रखेंगे तो धरती माँ भी खुश रहेगी . धरती का धर्म नहीं है , मजहब और जाति नहीं है …ये सबका फर्ज है …धरती माँ की आँखों में आँसू नहीं होने चाहियें।
लेखक-रेलवे विभाग दिल्ली में इंजीनियर है।
