खास-मेहमान

शब्द मसीहा : रात वाली रेनू

“साले! तुम लौंडे खुद को क्या समझते हो ? एक औरत कमजोर नहीं होती .” रेनू पर शायद नशा चढ़ गया था .

“नहीं , औरतें हमेशा वलरेबल होती हैं . इसलिए ही माँ-बाप उनका ख्याल रखते हैं .”

“माई फुट ….माँ-बाप ख्याल रखते हैं . साला बाप को कोई और पसंद आई उसने माँ को छोड़ दिया . माँ ने मजबूरी ओढ़ कर मन की कर ली और इस बाप से शादी कर ली . माँ है ….पर छोटी बहिन बनना चाहती है . साला मेरा क्या कसूर ….” न जाने क्या-क्या बडबडाती रही वह नशे में .

कोई चारा नहीं था . जीतें अपनी माँ का इकलौता बेटा था . वह उसे घर ले आया . माँ ने उसके कपडे बदल दिए थे और जीतें को अलग कमरे में सुला माँ रेनू के साथ सोई . माँ सुबह जल्दी उठ पूजा में जुट गयीं. घंटियों की आवाज से रेनू की नींद खुली तो देखा कि वह किसी अजनबी घर में है और उसके कपडे भी बदले हुए हैं . किसी तरह वह कमरे से बाहर आई . दरवाजे की आवाज से माँ का ध्यान उसकी और गया .

“बेटी ! पहले मुंह हाथ धो लो . मैं अभी चाय बनाती हूँ .”

रेनू की हालत बहुत ही बुरी थी शर्म के मारे. वह मुंह हाथ धोकर अपने कपडे देखने लगी .

“क्या देख रही हो बेटा ? कपडे मैंने धो दिए हैं . तुम्हारे लिए मैंने सूत सलवार रख दिया है उसे पहन लो और माधव को जगा दो वो उस कमरे में है . ”

कपडे बदल वह माधव के कमरे में गयी तो माधव जगा हुआ था . उसकी जैसे चीख ही निकल गयी .

“अरे! तुम तो इतनी सुन्दर हो . फिर वो पेट दिखाऊ और पैर चमकाऊ ड्रेस क्यों पहनती हो ?” माधव बोला .

“माँ ने कहा है तो पहन लिया !” रेनू बोली .

“वाह …मेरी माँ पर कब्ज़ा कर रही हो …हा हा हा . तुम तो माँ से नफरत करती हो अपनी .”

“हाँ, पर वो तुम्हारी माँ जैसी नहीं है . आज बेटी सुनकर बहुत ही अच्छा लगा . मैं तुम्हें बता नहीं सकती . तुम तैयार हो जाओ …मैं चाय बनाती हूँ”

तभी माँ ने प्रवेश किया और कहा -“एक बार चाय से काम नहीं चलेगा . बनानी है तो मेरे मरते तक बनानी पड़ेगी .”

रेनू और माधव माँ से लिपट गए. ममत्व की प्यास में सब तिरोहित हो गया था जैसे .

“माँ ! मैं चाय बनाती हूँ …पर और कुछ बनाना नहीं आता मुझे !” रेनू चहकते हुए बोली .

माधव उस रात वाली रेनू को बिसरा देना चाहता था .

शब्द मसीहा

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