शब्द मसीहा : परिवर्तन
यही कोई दो बजे का समय था मेरा चपरासी एक पर्ची लेकर आया बोला –
“साहब कोई गाँव वाला सा लगता है अपना नाम झाड़बेड़े बता रहा है . कहता है कभी आपके साथ था वो.”
मैंने पर्ची हाथ में ली और सोचने लगा . तब तक मैंने उन्हें भेजने को कह दिया था . कुछ -कुछ यद् आई .मेरे पास क्लास फोर का कर्मचारी था . जिसे एक दिन खाना नहीं लाने पर मैंने टोका था और पत्नी की शिकायत के बजाय उसकी शिकायत ख़त्म करने को कहा था . तब वह दारू बहुत पीता था . शायद उसे तीसरी लड़की होने पर बहुत दुःख था और पत्नी से झगडा करता था .
“साहेब ! नमस्कार .” वह कमरे में अन्दर घुसते हुए बोला . सफ़ेद खद्दर का कुरता , ऊपर जेकेट और धोती पहने था . सर पे आज भी वैसी ही सफ़ेद गांधी टोपी थी .
“आओ …आओ …कैसे हो तुम ? मैंने पूछा .
“साहेब ! एकदम मस्त हैं हम . आपकी बात हमको याद रही हमेशा . हम दो बेटी का शादी कर दिया . बस एक जिम्मेदारी बचा है हमको .”
“बधाई हो . क्या जिम्मेदारी बचा है ?” मैंने पूछा .
“एक बेटी का शादी और करना है .”
“मैं कोई मदद करूँ ?”
“नहीं…नहीं…साहब ! आपकी कृपा है . मुझे कुछ नहीं चाहिए . मैं गाँव में एक किताबघर बनाया है साहब . मेरा इच्छा है आप एक बार मेरा गाँव आयें .”
“अरे! वाह . तुम तो पढना नहीं जानते थे फिर किताबें ? और ये किताबघर किसके लिए .”
“साहब ! आप हमको जब बोला था कि बिना पढ़ाई के कोई बड़ा और अच्छा नहीं बन सकता तो बात हमारे मन को लगा था . मैंने अपनी बेटी से पढना शुरू किया . साहब पचपन साल में दसवीं किया मैंने . अब मैं रिटायर हो गया . माँ-बाप को मालूम नहीं था जो जन्म तारीख लिखाया उसके हिसाब से . पर साहब मैं बूढा नहीं हुआ .” वह अपना बाजू दिखाते हुए बोला .
“वही तो . तुम तो जवान हो अभी . बेटी का परिवार कैसा है ?” मैंने पूछा .
“बड़ी के पंद्रह बच्चे हैं और मंझली के पांच हैं .” वह बोला .
“क्या कहा ? पंद्रह और पांच ?” मैंने हैरत से पूछा .
“हाँ, साहब ! बड़ी बेटी को बड़ा नौकरी लगा और छोटी को छोटा है अभी . मेरी बेटी पंद्रह लड़की लोग का धर्म माँ बनी और उनका पढ़ाई का खर्चा उठाती है छोटी पांच लड़कियों का . आपकी वजह से हम भी अपने लोगों का दारू छुड़ाया और उनको पढना सीखने को बोला . ”
“ये तो बहुत अच्छा काम कर रहे हो तुम .” मैंने कहा .
“तुम्हें मेरा पता कैसे चला ?”
“वो हमारा गाँव का लड़का कुछ किताब लेकर आया था शहर से तो उसपर आपका फोटो था . हम बोला के तो हमारा साहब है . अब वो सब लोग आपको मिलना चाहते हैं . साहब ! हमको आपका बात बिलकुल समझ आ गया था भगवान् हमको गरीब और लाचार पैदा नहीं किया था . हम खुद को ऐसा मान लिए थे . अब हमारा पूरा गाँव बहुत अच्छा हो गया है . हम मिलकर सब काम करते हैं किसी का जातिवाती का भी चिंता फिकर नहीं . अपना जाति का सब लोग हमारा माल आपस में खरीदता बेचता है . हम खुद अपनी उपज बेचते हैं . सांझा गाडी , साझा कुआं और बिजली सब साझा है हमारे गाँव में में.” वह बोलता जा रहा था .
“हा हा हा ….तुम और तुम्हारे गाँव वाले अब सच समझ गए हैं . नयी सोच का सूरज उग गया है तुम्हारे गाँव में . अब कोई तुम्हें रोक नहीं सकता . शिक्षा , संगठन और संघर्ष का फल मिलता ही है .”
“साहेब ! ये बड़ा बात आप कहानी में बहुत अच्छे से बताते हो . मेरा आपको बुलावा है . मन नहीं करना साहेब . अभी आपको 14 अप्रेल को उधर आना है . बहुत वक्त है .” और उसने मेरे सामने एक लिफाफा रख दिया .
“ये क्या है ?”
“वो आप लेखक हैं न तो आपके आने-जाने के टिकट का पैसा और कुछ सम्मान का पैसा है .”
” झाड़बेड़े…सही कहता था . तुम पढ़ लिखकर अभी भी वैसे ही हो .” मैंने गुस्सा दिखाते हुए कहा .
“इधर भी कोई अपने जैसा है साहब ! उसको भी पढने को बोलना .”
“ये सब उठाओ . मैं तुम्हारे यहाँ आने के कोई पैसे नहीं लूंगा . मेरा मेहनताना तो तुम्हारी तरक्की है . तुम्हारी तरक्की से ही देश आगे बढेगा .” मैंने कहा .
“साहब ! आपको मैं गले लगना चाहता हूँ .”
मुझे ऐसा लगा था जैसे कोई भाई जीवन की परीक्षा में पास हो गया था . उसने अपने साथ-साथ पूरे गाँव के गरीबों को बदल डाला था . वह मेरे लिए एक मिसाल था जीवंत .
शब्द मसीहा

