रचनाकार

रुख हवा का भी देखो इधर तो नहीं

(दिनेश दर्पण )

यहां भी रखा है देखो उधर तो नहीं।
ये किसी बेरुखी का असर तो नहीं।

हम तो सोए है भरचक से विरानो में।
कोई बस्ती से पूछो कि डर तो नहीं।

सांस लेता खुदा भी यहां सोचकर ।
या खुदा तेरा आना दूभर तो नहीं।

घर से निकले है यू तो कई बार हम।
पर यही फैसले का सफर तो नहीं।

सारी दुनिया दिखाई नहीं दी तुम्हे।
आपकी फिर से हम पर नजर तो नहीं।

रोशनी को भी महफुजियत चाहिए
रुख हवा का भी देखो इधर तो नहीं।

लेखक- दिनेश दर्पण, रतलाम, मध्यप्रदेश

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