पुस्तक समीक्षा : अलौकिक प्रेम की यात्रा है “अमृता लव एट 50”

■ तेजस पूनिया ने शब्द मसीहा केदारनाथ की पुस्तक “अमृता लव एट 50” की समीक्षा करते हुए उसकी एक-एक बारीकियों के बारे में बताया है पूनिया लिखते हैं कि ताज़ा-ताज़ा पढ़े उपन्यास ‘अमृता लव एट 50’ की। उपन्यास के भीतर प्रेम परक कविताएं, गज़लें, शेष इस उपन्यास की खासियत हैं। और प्रेम परक उपन्यास है, तो बता दें कि प्रेम के दो रूप होते हैं, लौकिक और अलौकिक। लौकिक से प्रेम तो मनुष्य ताउम्र करता है, लेकिन जब उसका प्रेम लौकिक से ऊपर उठकर अलौकिक हो जाता है, तब वह असल मायने में प्रेम को जीने लगता है।

तुम क्या जानों
प्रेम क्या होता है?
न रूप
न संवाद
न मिलन
न चाह
न शिकायत
प्रेम होता है
केवल मनन
केवल स्मरण
केवल मौन
स्वयं का विस्मरण
कुछ और नहीं है कहने को

ये पंक्तियां हैं ताज़ा-ताज़ा पढ़े उपन्यास ‘अमृता लव एट 50’ की। उपन्यास के भीतर प्रेम परक कविताएं, गज़लें, शेष इस उपन्यास की खासियत हैं। और प्रेम परक उपन्यास है, तो बता दें कि प्रेम के दो रूप होते हैं, लौकिक और अलौकिक। लौकिक से प्रेम तो मनुष्य ताउम्र करता है, लेकिन जब उसका प्रेम लौकिक से ऊपर उठकर अलौकिक हो जाता है, तब वह असल मायने में प्रेम को जीने लगता है। मुझे सिनेमा बहुत पसंद है, इसलिए इस उपन्यास को पढ़ते हुए भी कई प्रेम कथाएँ मेरे मन मस्तिष्क में फिल्मों की चलती रहीं। रात को एक ही सिटिंग में मात्र दो घन्टे में एक सौ चौदह पेज का उपन्यास पढ़ गया। प्रेम को लेकर खामोशी फ़िल्म का गाना हमने देखी है उन आँखों की, जिसे सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने गाया था और इसके बोल लिखे थे गुलज़ार साहब ने, वह इस उपन्यास में सार्थक होता है।

एक कैंसर पीड़ित नायिका जो तीस-पैंतीस बरस की है। जिसके बारे में उपन्यास का नायक नहीं जानता। जानता है तो बस इतना कि वह उसकी फेसबुक मित्र है और एक दिन उस लड़की का मैसेज आता है। चुटीले अंदाज में वह नायक से बातें करती हैं। नायक का दिल पहले पहल तो घबराता है कि कहीं कोई उसके साथ जालसाजी न कर दे या उसके साथ हुई इस अंतरंग बातचीत के स्क्रीनशॉट न लगा दे। वैसे फेसबुक पर भी भला कोई प्रेम होता है ? जी होता है न आज के विज्ञान के युग के युग में होने लगा है। विज्ञान के साथ-साथ हमारे दिल और दिमाग ने भी इतनी तरक्की कर ली है शायद कि हम आभासी दुनिया में प्रेम तलाशने लगे हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रेम हमारे जीवन से निसृत हो चुका है। हम भाग दौड़ भरी दुनिया में दौड़ते जा रहे हैं। हमें प्रेम को पाने की थाह ही नजर नहीं आती कहीं। और फिर थोड़ा हम ठहरते हैं तो फेसबुक और सोशल मीडिया पर प्रेम तलाशने लगते हैं। खैर नायक इस उपन्यास का लेखक स्वयं ही हैं और अन्य पात्र भी उनके अपने मित्र ही हैं। इसके साथ ही प्रकाशक की भूमिका भी उपन्यास में नजर आती है।

इस तरह के हल्के-फुल्के उपन्यासों की कहानियों को पढ़ते हुए भी हम ज्यादा देर सहज नहीं रह पाते। बल्कि इनका कथ्य और भाषा शैली हल्की-फुल्की होने के बाद भी हमें असहज बना देती हैए और सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या वास्तव में फेसबुक की दुनिया से निकला प्यार अलौकिकता के चरम बिंदु पर पहुंच सकता है। उपन्यास की कहानी फेसबुक से शुरू तो होती है लेकिन मुलाकात पर जाकर खत्म होती है। हालांकि उपन्यास की कहानी भले ही खत्म हो जाती है किंतु यह हमें आभास कराती है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है बल्कि शुरू हुई है।

फेसबुक एक ऐसी दुनिया है जिसमें हम किसी तीसरे का प्रवेश करा लेते हैंए लेकिन अपनी जिंदगी में हम उसका प्रवेश अनधिकृत ही मानते हैं। और इसी को लेकर एक अच्छी पंक्ति लेखक लिखते हैं किसी की निजता में किसी का अनधिकृत प्रवेश वर्जित ही रहना चाहिए। यूँ तो फेसबुक की भी अपनी मर्यादा है अगर आप रखना चाहें तोए लेकिन लोग कहाँ तक आभासी दुनिया पर मर्यादाओं का पालन करते हैं। इस उपन्यास में उन मर्यादाओं का भी ख्याल रखा गया है। लेकिन एक बात जेहन में उठती है कि यह उपन्यास और इसकी कहानी जब वास्तविकता पर आधारित है तो जब लेखक स्वयं नायक बनकर डरता है कि कहीं उसका भांडा न फूट जाए तो आखिर फिर वह स्वयं उस लड़की के पति के कहने मात्र पर इसकी कहानी क्यों लिख देता है। क्या इसे पढ़कर उसका भांडा नहीं फूटेगा। सिर पर पके बालों में हाथ फेरते हुए नायक को अपनी उम्र का ख्याल भी होता है यदा कदा लेकिन एक कहावत है “साठी बुद्धि नाठी” यानी साठ की उम्र में मनुष्य पगला जाता है। लेकिन नायक ठहरा पुरुष वह तो पचास की वइस में ही भटकने लगता है। इसका कारण भी उपन्यास में नजर आता है कि उसकी अध्यापिका पत्नी से उसका प्रेम विवाह नहीं बल्कि समायोजित विवाह यानी अरेंज मैरिज हुई है।

खैर नायक नायिका दोनों शेरो.शायरी से बातें करते हैंए नायक जब कभी उलझन में होता है या नायिका की याद में तड़पता है तो गजलें लिखने बैठ जाता है। उधर नायिका के प्रेम विवाह का जिक्र भी उपन्यास में है लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि प्रेम का अभाव तो नायक के जीवन में था नायिका का तो प्रेम विवाह हुआ था। उसका पति उसके साथ कॉलेज में पढ़ा था और शादी के बाद भी पति से कहीं ज्यादा उसका दोस्त बनकर रह रहा था। और जब वह नायक से बात करती है तो भी उसके पति को सब मालूम होता है लेकिन वह उसकी बीमारी के चलते उसे मात्र खुश रखने के बहाने से छूट दे देता है। लेकिन नायिका अमृता के जीवन में प्रेम का ऐसा कौन सा सोता थाए जो बहने से रुक गया थाए या ऐसा कौन सा झरना था जिसमें रुकावट आ गई थी कि उसे अपने प्रेम के लिए फेसबुक के माध्यम से दूसरा रास्ता तलाशना पड़ा।

जाने कब उतरेगा कर्ज़ उसकी मोहब्बत का
हर रोज आँसुओं से इश्क़ की क़िस्त भरते हैं

जब ये सब तरह के शेष्र नायिका लिखती है तो उसके भीतर के प्रेम का प्रस्फुटन भी होता नजर आता है। शेष्रए गज़ल आदि का सहारा किसी उपन्यास में लियाया गया मैंने पहली बार देखा है। हालांकि एक आध शेर तो पहले भी कहानीए उपन्यासों में पढ़े हैं लेकिन इतनी ज्यादा मात्रा में। ये सब भी उपन्यास की कथा को आगे बढ़ाते हैं। इसके अलावा उपन्यास में कुछ एक जगह गद्य में ही तुकबंदी का समायोजन देखना अच्छा लगता है। और इस तरह पूरे उपन्यास को पढ़ते हुए अपनी गिरफ्त में बनाए रखने की अच्छी कोशिश है।

यह उपन्यास स्त्री विमर्श के साथ.साथ प्रेम विमर्श पर भी स्वाभाविकता से संवाद करता नजर आता है। प्रेम के लिए मूक प्रार्थना भी इस उपन्यास में नजर आती है। जब नायिका बीमार होती है और नायिका के पति से नायक को ज्ञात होता है कि वह बीमार है तो नायक के माध्यम से लेखक कहता है । ‘मैंने अपने जीवन का बहुत ही कड़वा अनुभव पाया था। आज से पहले मैं हमेशा यही समझता था कि पुरुष कठोर होता है और कभी भी अपनी पत्नी से किसी और का इस तरह का सम्बंध उसे बर्दाश्त नहीं होता लेकिन सुधाकर नाम से ही नहीं बल्कि जीने के अंदाज़ से भी सुधाकर ही था। इतना गहरा प्रेम और विश्वास बहुत किस्मत से मिलता है। उस रोज मुझे न चाहते हुए भी भगवान पर भरोसा हो गया था। शायद तभी से मेरी मूक प्रार्थना शुरू हो गयी थी अमृता के लिए।’

प्यार कभी सूरत से नहीं हमेशा सीरत से होता है। वर्तमान दौर में भले ही इसका उलट चल रहा हो लेकिन फिर भी हमारे जीवन में कभी न कभी किसी न किसी मोड़ पर कोई ऐसा व्यक्ति दस्तक दे ही जाता है कि हमारे लिए भी प्रेम के माने रूहानी और अलौकिक हो जाते हैं। वर्तमान समाज में किसी तीसरे का परिवार और जीवन में शामिल हो जाना अक्षम्य है। समाज अभी तक किसी औरत का भावनात्मक सम्बन्ध भी बर्दाश्त नहीं करता है। यह सच है।

मैं एक रास्ता हूँ और तू मुसाफ़िर की तरह
तेरी खुशबू से महका हूँ तेरा ही नाम लेकर मैं।

जब ये शेर लेखक के रूप में नायक के मुख से निसृत होता है तो लगता है नायिका और नायक दोनों एकाकार हो चले हैं प्रेम के इस पथ पर। उपन्यास के अंत में नायिका से नायक का मिलने जाना उसे ठीक करने के लिए रेकी देना और उसकी हालत में सुधार होना दर्शाता है कि उनका प्रेम अलौकिकता के चरम बिंदु पर पहुंच चुका है।

उपन्यास की कहानी अपने आप में नई है। प्रेम के माने भी नए हैं। प्रेम की अभिव्यक्ति भी नई है, बावजूद इसके यह लेकिन… जैसा प्रश्न पाठक के दिमाग में छोड़ जाता है। बतौर आलोचक मुझे इसको पढ़ते हुए लगा शुरुआत में की इसपर शोध कार्य किया जा सकता है। बीच में थोड़ा लगा नहीं यह केवल मनोरंजन परक है। लेकिन अंत में आकर फिर से लेखक चौंका देते हैं और अंतिम फैसला हमारा यह होता है कि इस उपन्यास पर ही नहीं बल्कि ऐसी लेखन शैली है जिसमें गम्भीरता न होते हुए भी उसके माने बड़े फलक को लिए हुए है तो उस पर शोध कार्य किया जा सकता है। उपन्यास की एक बड़ी कमी है कि लगभग सत्तर-अस्सी पेज तक लेखक अपने आप को नायक बनाकर अपनी और नायिका की बातें ही कहता रहता है। बीच में बहुत ही कम जगह अन्य पात्रों को मिल पाई है। इस वजह से यह लंबी कहानी का रूप लेता चला जाता है। लेकिन अस्सी पेज पढ़ लेने के उपरांत कहानी में बदलाव आने शुरू होते हैं और यह अंततः उपन्यास के रूप में बदलकर हमारे सामने प्रस्तुत होता है।

तेजस पूनियां
शिक्षा. शिक्षा स्नातक ;बीएड
177 गणगौर नगर ए गली नँबर 3ए नजदीक आर एल जी गेस्ट हाउस
संपर्क .9166373652
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कहानी संग्रह – “रोशनाई” अकेडमिक बुक्स ऑफ़ इंडिया दिल्ली से प्रकाशित।

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