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गलत शौक : कम पैसे में अच्छी मोबाइल की चाह युवाओं को पहुंचा रही जेल, अभिभावक भी जिम्मेदार

(अशोक जायसवाल)

बिल्थरारारोड/बलिया। कम पैसों में अच्छी मोबाइल की इच्छा ने अबतक कईयों को जेल की सलाखों तक पहुंचाया है। सेकेण्ड हैण्ड मोबाइल खरीदने वालों की तब बैण्ड बज जाती है जब उक्त मोबाइल किसी हत्यारे या लुटेरे की निकल जाती है। पुलिस टीम द्वारा जब सर्विलांस की सहायता से किसी लूट या हत्या के मामले की जांच की जाती है तो अक्सर ऐसे खरीददार ही उनकी जद में आते हैं। ऐसे मामले में फंसने के बाद ही लोगों को सेकेंड हैंड मोबाइल की महिमा का भान होता है। पुलिस द्वारा तथा सामाजिक जागरूक लोगों द्वारा इसके लिए बार-बार आगाह भी किया जाता है, बावजूद लोग सस्ती मोबाइल की चाह से उबर नही पा रहे हैं। यही कारण है कि इसके चलते अनेक बेकसूर युवक पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं।

बढ़िया मोबाइल रखकर स्टेट्स सिम्बल मेंटेन करने की चाह व
कम पैसों में अच्छी मोबाइल रखने की इच्छा आज हर उन नौजवानों में बलवती होती जा रही है जो शार्ट कट से शौख को पूरा करना चाहते हैं। जब से 4 जी नेटवर्क का उदय हुआ है तबसे यह इच्छा युवाओं व बच्चों में और प्रबल होती जा रही है। सस्ते मोबाइल के चक्कर में युवा बिना जांचे समझे सेकेण्ड हैण्ड मोबाइल को लेने से अपने को नही रोक पाते हैं। यही इच्छा उनके लिए बड़ी मुसीबत बनती रही है। हत्या व लूट के अनेक मामलों में सेकेण्ड हैण्ड मोबाइल का लोगों के लिए मुसीबत बनकर सामने आना जारी है। बावजूद युवा व अन्य लोग कम पैसे में अच्छी मोबाइल की चाह छोड़ नही पा रहे हैं।

मोबाइल दुकानदारों द्वारा भी कुछ रूपये की कमाई की चाह में पुरानी मोबाइल की खरीद-फरोख्त आम बात हो गयी है। परन्तु जब पुलिस किसी हत्या व लूट का पर्दाफास के लिए सर्विलांस के सहारे उनतक पहुंचती है तब लोगों को सस्ती मोबाइल लेने की दुश्वारियां का भान होता है परन्तु तब तक काफी देर हो जाती है तथा वे पुलिस की गिरफ्त में पहुंच जाते हैं। अब तक ऐसे मोबाइल के चक्कर में न जाने कितने लोग जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। पुलिस प्रशासन द्वारा इस सम्बन्ध में लोगों को बार-बार चेताया जाता है बावजूद लोग कम पैसे में आकर्षक मोबाइल लेने का मोह नही त्याग पा रहे हैं तथा जीवन को दांव पर लगाकर पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं।

वहीं युवा जब अपने पास रखे मोबाइल की वजह से फंसते हैं तब जाकर परिजनों की निन्द्रा भंग होती है। ऐसे में बच्चे व युवा गलती तो कर जाते ही हैं पर परिजन भी कम दोषी नहीं हैं जो बच्चों के हाथ में मोबाइल की तहकीकात नहीं करते। अगर शुरुआती दौर में ही जांच पड़ताल कर लेते तो शायद वह बच्चे गुनाहगार होने से बच जाते जो नियम कानून नहीं जानते या अनदेखी करते।
सामाजिक सरोकारों से जुड़े डीसीएसके पीजी कालेज मऊ में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर डा. सर्वेस पाण्डेय का कहना है कि अभिभावक बच्चों को मोबाइल हेतु रुपये देते हैं, या बगैर रुपये दिए उनके बच्चे के हाथ में मोबाइल है तो उनकी जिम्मेदारी है कि बच्चों के इस प्रकार की खरीदारी पर नजर रखें। इतना ही नहीं अगर कोई बच्चा ऐसे मामले फंसता है और अखबारों में छपे समाचार के दोनों पहलू पर बच्चों को फायदे व नुकसान समझायें।

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