कुछ अलग : एक पत्र खुद के नाम
पंकज शुक्ला (आवारा)
आज मेरी उम्र 26 वर्ष है अगर सब कुछ सही रहा और किसी बीमारी या दुर्घटना से आकस्मिक मृत्यु नही हुई तो शायद 30 से 35 वर्ष औऱ जी पाऊंगा
पर जो ये बातें आज मेरे दिमाग मे है क्या मैं उनसे मुक्त हो पाऊंगा क्योकि सारे चिन्ताओ का हमारे शरीर मे अलग अलग प्रभाव है
फिर भी हम जी रहे है
खुश होने की कोशिश कर रहे है।
आखिर क्यो एक छोटी सी दिन भर की नॉकरी के पीछे है इंसान
आखिर क्यों कुछ पैसे इतने जरूरी है
कि हम घर से दूर हो जाते है
आखिर ऐसा क्या है जो माँ बाप के प्रति स्नेह तो रखता है पर उनके साथ रहने का मन नही होने देता
आखिर क्यो हमे लगती है कि हमारी आज़ादी छिन रही है
आखिर हम आजाद रह कर क्या कर लेंगे
आखिर क्यों मन के विचार स्थायी नही हो पाते
आखिर क्यों इंसान जो सोच रहा है वो कर नही पाता
आखिर क्यों हमारा मन हमारे बस में नही है
आखिर क्यों हम दिन भर अपने जीवन को ले कर सोच रहे
आखिर क्यों हमे पता होने के बाद भी हम उस पर उलझ जाते है
पता है ये सब सोच कर दिन कैसे निकल जाता है पता नही चलता।
पर सच तो ये है कि इन सब का कोई हल नही है।
किसी से सुना कि गीता में सब का हल है मैंने सारी गीता पढ़ी एक बार नही 2 बार।
यु ट्यूब चैनल पर देखी भी, पर तुम्हे पता है उसे भी मानने के लिए मेरा मन तैयार नही।
मैने पढ़ा किमन के बहकावे में न आकर मन को अपना दास बना लो
पर आप मुझे बताइये क्या इतना आसान है इस आधुनिक युग मे।
जहाँ 2 मिंट भी फ़ोन हाथ से दूर रहे,तो ऐसा लगता है कि कुछ अधूरा है।
चलिये लगा कि फ़ोन ही बंद कर दूं
पर दुनियाभर से अलग होने से क्या लाभ।
ये नोटिफिकेशन मुझे तो फ़ोन के संस्कार लगते है।
जब बचपन मे दादी दादा या कोई बड़े आवाज लगाते थे, तो हमे वहाँ तुरन्त जवाब देना हमारे संस्कार प्रदर्शित करता था।
आज वही हमारे फ़ोन के साथ है।
जो लोग ज़िन्दगी में कुछ बड़ा कर लिए या बहुत खुश है उनके ज़िन्दगी में कुछ अलग ही प्रकार की चिंताएं है।
और इन सब से अगर थोड़ी फुर्सत निकाल भी लू तो दूसरों की तरक़्क़ी उनका आगे बढ़ना मुझसे देखा नही जाता जानता हूं कि ये मानव की प्रकृति ही है।
पर क्यो जब मैं नही चाहता अपने अंदर से ऐसा होना तो फिर क्यो जन्म लेते है ये विचार मेरे अंदर।
क्यों इतना कमजोर हूँ मैं।
सच सुना तुमने ये मैने खुद के लिए ही कहा है
सुबह के नींद खुलने से लेकर रात को सोने तक बस तेरी याद ,याद भी कैसी तुझे पाने की या तुझमे खो जाने की ,या फिर अपने अकेले पन में बढ़ती बेचैनी मेरी इंद्रियों की।
आखिर क्यों इतनी ललक है मेरे अंदर ???
सवाल कई है जवाब नहीं
आज जब इंसान अकेले बैठ जाये तो उसे यह समझ ही नही आता कि वो करे तो क्या करे।
कभी उसे कैरियर की चिंता, घर वालो की चिंता, तो अपनी खुशियों की चिंता
या फिर यौवन भंवर में फसे मन की चिंता ।
तो क्या ऐसा कर दूं जिससे खुद के अंदर के शोर को कम कर सकूँ उसे अंदर ही दफन कर सकूँ और अपने इस आवारगी को खत्म कर सुकून हासिल कर सकूँ।
पंकज शुक्ला(आवारा)
भिलाई छत्तीसगढ़
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