अब संभलने का वक्त है शायद, उठ के चलने का वक़्त है शायद
@ दिनेश दर्पण
1-
अब संभलने का वक्त है शायद।
उठ के चलने का वक़्त है शायद।
2-
बात वो कल की हो गई होगी
दिन बदलने का वक्त है शायद।
3-
सर कलम उसने कर दिया होगा
अब मचलने का वक़्त है शायद।
4-
दिल तो देगा नहीं वो मांगकर भी
ज़िद पे अड़ने का वक़्त है शायद।
5-
अब तो ग़म की भी इंतहा सी हुई
आंख भरने का वक़्त है शायद।
6-
कब तलक दिल में लिए बैठेंगे
बात करने का वक़्त है शायद।
7-
चोट से आह अब निकलती नहीं
ज़खम भरने का वक़्त है शायद।
8-
आज तक कुछ असर नहीं उसपर
सिर पटकने का वक़्त है शायद।
9-
चढ़ते चढ़ते वो चढ़ गया सिर पर
अब उतरने का वक़्त है शायद।
10-
हाल बेहाल हो गया उसका
अब संवरने का वक़्त है शायद।
11-
उठ गया आंख से शराब का पर्दा
होश आने का वक्त है शायद।
12-
अब तो सांसे भी थम गई उसकी
दम निकलने का वक़्त है शायद।
13-
आज तक कोसता रहा खुद को
नाज़ करने का वक़्त है शायद।

