शब्द मसीहा की कहानी : तो बीमारी ही अच्छी है
पत्नी की कराहट सुनकर मुकेश की नींद खुल गई थी अलसुबह .
“क्या हुआ ? तबियत ठीक तो है ?” मुकेश ने पूछा .
“नहीं , आज लगता है बुखार तेज हो गया है . बच्चों को स्कूल और कालेज भी जाना है . काम तो करना ही है .”
“तुम खाली रोटियाँ बना दो मैं नहाकर आता हूँ . बाकी काम मैं कर दूंगा .” और मुकेश रजाई से बाहर निकल ऊपर नहाने के लिए चला गया .कुछ देर बाद लौटा और पत्नी का माथा छुआ . माथा बहुत गर्म था .
“हद है यार …कम से कम मुझे जगा लेती तुम .”
“रात तो झगडा कर के खाना भी नहीं खाया तुमने और इतना प्यार जता रहे हो ?”
“लड़ाई का मुद्दा होता है . बेबकूफी का नहीं . तुम्हें जरा अहसास नहीं कि ज्यादा तबियत खराब हो गई तो क्या होगा . जाओ ऊपर पानी गर्म है . नमक डालकर नहा लो . अच्छा लगेगा . मैं लंच पैक करता हूँ और रसोई को ठीक कर देता हूँ .”
कुछ ही देर में सबके लंच पैक हो गए थे और बर्तन भी साफ़ हो गए थे . मर्द हाथों की मार से रसोई भी चमक उठी थी . कुछ देर बाद वंदना नीचे आई तो देखकर हैरान रह गई . बच्चों के लंच पर चिट लगी हुई थी . उसका बैग और लंच तैयार था . चाय के कप के साथ बुखार की दवा रखी हुई थी और मुकेश के हाथ में पोछा था .
“रहने दो . बस इतना ही बहुत है . बच्चों को जगा दो . बाकी काम आकर कर लूँगी .”
“तुम कब जागोगी ? इतनी बार कहा है कि सारे दिन ऑफिस में जूझने के बाद तुमसे झगड़ने की ताकत नहीं बचती है मुझमें . कुछ तो समझा करो .” मुकेश बोला .
“अब क्या किसी पडोसी से झगडा करने जाऊं ? शाम को आकर तुम ही रसोई सम्हालना , मेरा ठीक होने का मन नहीं है .”
“क्यों ?”
“अगर बीमार होने से प्यार मिलता है तो बीमारी ही अच्छी है …हा हा हा .”
और बाल काढ़ते हुए सिर घुमाकर मुकेश के चेहरे को अपने लम्बे बालों से ढँक उसकी आँखों में निहारने लगी .
शब्द मसीहा

