महिला सुरक्षा की बाट जोहता भारत
शालिनी श्रीवास्तव…
(मुक्त लेखिका)
लखनऊ। थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन जो कि समाचार नेटवर्क थॉमसन रायटर्स की एक शाखा एवं पंजीकृत चैरिटी है। जिसका मुख्यालय लंदन में है। इसने हाल ही में अपने एक पोल में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया है। महिला मुद्दों के 550 विशेषज्ञों के सर्वेक्षण वाली यह रिपोर्ट लैंगिक हमलों, मानव तस्करी, बंधुवा मजदूरी, जबरन शादी और यौन दासता पर आधारित है। इस लिस्ट में भारत को अफगानिस्तान और पकिस्तान से भी बदतर दिखाया गया है।
2011 में थॉमसन रायटर्स ने अपने पोल में अफगानिस्तान को पहले नंबर पर रखा था, लेकिन अब 2018 में भारत को महिला सुरक्षा के मामले में सबसे खतरनाक देशों में पहले नंबर पर रखा है। इस रिपोर्ट में कितनी सच्चाई है इसका ठीक-ठीक आकलन करना तो मुश्किल है मगर इतना जरूर है कि इस रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर महिला सुरक्षा को लेकर भारत की वर्तमान स्थिति को ना सिर्फ जगजाहिर किया है बल्कि महिला मुद्दों पर भारत की छवि भी धूमिल की है। जिसका कारण हाल ही में हुए कई दर्दनाक बलात्कार कांडों को भी माना जा सकता है। जिसने समूचे विश्व का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया।
निर्भया के बाद कठुवा कांड ने पूरे देश के साथ विश्व को बता दिया कि भारत महिला सुरक्षा को लेकर किस हद तक गंभीर है। निर्भया कांड के बाद ऐसा समझा जाने लगा था कि शायद प्रसाशन की चुस्ती और कड़े कानून, ऐसे जघन्य अपराधों को रोक सकेंगे ए मगर एक के बाद एक दुष्कर्म की घटनाओं ने प्रसाशन और कानूनों की पोल खोल दी । आलम ये है कि महिला मुद्दों पर दूसरों को जागरूक करने वाली महिलाएं भी अब सुरक्षित नहीं रह गई है। झारखण्ड में हुए गैंग रेप ने इस बात की पुष्टि कर दी, आज नवजातो, नाबालिगों के साथ रेप तथा गैंग रेप इस बात की तरफ इशारा कर रहे है कि महिला मुद्दो पर संवेदनशीलता बिल्कुल शून्य होती जा रही है ।
भले ही राष्ट्रीय महिला आयोग ने थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन की इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया हो, मगर सच्चाई यह है कि महिला सुरक्षा आज भी चिंताजनक स्थिति में है। महिलाएं आज भी घर हो या दफ्तर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है। तमाम तरह की महिला सुरक्षा योजनाएं एसंस्थाएं एवं सुविधाएं सिर्फ कोरी कल्पना मात्र है। हक़ीक़त के धरातल पर अब भी महिलाओं के लिए बने कानून और सुविधाएं छलावा मात्र है। आज भी महिला अपराधों में कहीं से कोई कमी होती नहीं दिख रही। महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीतिक रोटियां सिकती है और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नाम पर वोट बैंक भरे जाते है। आधी आबादी कही जाने वाली को जब मौजूदा सरकार संसद में प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण नहीं दे पा रही है तो सुरक्षा कैसे दे पायेगी।
पूरे देश में ऐसी कोई एकल हेल्पलाइन नहीं है जहाँ महिलाएं अपने खिलाफ हो रहे दुराचार की सुचना तुरंत देकर निवारण पा सके। डिजिटल होती दुनिया में हर तरह की सुविधाएं एइलेक्ट्रॉनिक ऍप व् अन्य तकनीक सहायक उपकरण उपलब्ध है मगर फिर भी महिलाएं असुरक्षित है आखिर क्यों, जिन राज्यों ने महिला सुरक्षा और सहायता के नाम पर महिला हेल्प लाइन की शरूआत की है वह या तो आमतौर पर बंद पड़ी रहती है जैसे की बिहार में या फिर ऐसी अवस्था में होती है जिससे महिला समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। इन संस्थाओं को इतना शक्तिशाली नहीं बनाया गया है ताकि वह अपराधी को सजा दे सके।
यह सिर्फ समझाने-बुझाने और मामले को तत्काल बातचीत के जरिये निपटारे तक ही सीमित है। सरकार द्वारा शुरू की गई बहुत सारी ऑनलाइन सेवाओं का भी यही हाल है। तुरंत सूचना मिलने के बाद भी लेटलतीफी देखने को मिलता रहता है। देश में सबसे ज्यादा महिला अपराध वाला राज्य उत्तरप्रदेश में जहाँ 1090, प्रधानमंत्री हेल्पलाईन तथा महिला अपराध के ख़िलाफ़ ऑनलाइन एफआईआर जैसी सुविधाएं है यहाँ भी महिला अत्याचार के मामले बढ़ते जा रहे है। आमतौर पर ज्यादातर मामले जैसे ही प्रकाश में आते है उन्हें यथाशीघ्र रफा-दफा करने की कोशिश की जाती है। ऐसे में समस्या को जड़ से ख़त्म नहीं किया जाता फलतः वह ज्यो का त्यों बनी रहती है। और इस कारण महिला अपराध घटने की बजाये बढ़ते जाते है।
महिला हिंसा के ज्यादातर मामलों में पुलिस या महिला हेल्पलाइन द्वारा सरकार की छवि को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही की जाती है और महिलाओं पर होने वाले अपराधों या अत्याचारो पर थानों में एफ आई आर तक नहीं लिखी जाती। ताकि आंकड़ों में यह दिखाया जा सके कि अमुक सरकार के कार्यकाल में महिलाएं सुरक्षित रही । इसलिए सरकारी आंकड़ों पर भी बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है।
सभी को ज्ञात है कि महिला अपराध जितनी तादाद में होते है उसका केवल एक चौथाई मामला ही थानों तक पहुँच पाता है। और उसका भी ढंग से निपटारा नहीं हो पाता। राष्ट्रीय महिला आयोग से शिकायत करनी होए ऑनलाइन एफ आई आर हो या फिर थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाना हो सारी प्रक्रिया लंबी और बोझिल है। ऊपर से जागरूकता में कमी और अशिक्षा न्याय को और कष्टकारी बना देता है। तमाम दबाव एजांच.पड़ताल और पूछताछ से गुजरने के बाद महिला रिपोर्ट लिखी जाती है और उसके बाद कभी लोक लाज के भय से कभी बार-बार पुलिस कार्यवाही और थाने के आवाजाही से परेशान होकर ज्यादातर महिलाएं केस बीच में ही छोड़ देती है। जिसकी जवाबदेही किसी की नहीं है और ना ही इसकी सुध ही लेने वाला कोई है।
बलात्कार की रिपोर्टिंग तक मामले कुछ दिन तक संज्ञान में रहते है और उसके बाद उन मामलों का क्या होता है एक्या नतीजा निकलता है इसका पता नहीं चल पाता।
महिला आयोग का मानना है कि भारत में महिलाएं जागरूक हुई है और अब महिला अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार की शिकायत ज्यादा तादाद में करने लगी है। महिला अपराध में शिकायतों की संख्या का बढ़ना निश्चित ही ठीक संकेत नहीं है । मगर महिलाएं जागरूक हुई है इसमें कोई दो राय नहीं है । तमाम जागरूकता और सुविधाओं के बावजूद भी अगर अपराध बढ़ रहे है तो यह चिंता का विषय है जिसकी पड़ताल की तत्काल जरुरत है।
सरकारी आंकड़ों की माने तो 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के मामलों में 83 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान हर चार घंटे में एक महिला बलात्कार की शिकार होती है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की 2018 जनवरी से जून तक के आंकड़ों को देखे तो सभी राज्यों को मिलाकर अबतक महिला अपराध के 10081 मामले दर्ज किये गए है। जिनमे सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश में 5885 मामले दर्ज हुए है इसके बाद देश की राजधानी दिल्ली में तक़रीबन 965 मामले दर्ज हुए है।
गौरवपूर्ण जीवन जीने का अधिकार, महिला हिंसा और पुलिस उदासीनता के तहत सबसे अधिक मामले दर्ज किये गए है। साफ़ जाहिर है कि पुलिस प्रसाशन की लापरवाही भी महिला अपराधों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
महिला अपराधों को कम करने के लिए यह जानना बेहद जरुरी है कि महिला अपराध में दर्ज मामले किस हद तक और कैसे निपटाए जा रहे है। लगातार काउंसलिंग के जरिये महिला को सबल और जागरूक करने की जरुरत है और समस्या को जड़ से ख़त्म करने की जरुरत है।
आमतौर पर बलात्कार का तो पता चल जाता है मगर दुष्कर्मी को सजा हुई या नहीं या महिला की स्थिति 4 साल बाद कैसी है इसका पता नहीं चल पाता है और ना ही वास्तविक स्थिति जानने के लिए कोई सरकारी प्रयास ही किया जाता है ।
2005 में घरेलु हिंसा कानून बनाया गयाए मगर आज भी महिला हिंसा और उनकी स्थिति के वास्तविक विश्लेषण से सम्बंधित समग्र आंकड़े उपलब्ध नहीं है। ना ही ऐसा कोई आँकड़ा उपलब्ध है कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज एफ आई आर में कितने व्यक्ति को सजा हो पाई या कितने को इंसाफ मिल पाया। महिला सुरक्षा सिर्फ इस बात से तय नहीं की जा सकती की महिलाएं अब अपने खिलाफ हो रहे अपराध को दर्ज करा रही है बल्कि इस बात को भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके द्वारा दर्ज मामलों का निपटारा कितना तीव्र हुआ और किस हद तक हुआ। साथ ही पुरुषों की ऐसी मानसिकता को जड़ से बदलने की जरुरत है।
जैसा कि युगांडा में किया गया। इस देश में एक प्रोजेक्ट सासा के जरिए पुरुषों की बार-बार कॉउंसलिंग की गयी। जिसमे ना सिर्फ उनको महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों के बारे में बताया एवं जागरूक किया गया बल्कि उनकी सोच को जड़ से बदलने की कोशिश गयी। जिससे आगे आने वाली पीढ़ी में एक स्वच्छ सोच पनप सके। ऐसे प्रोजेक्ट को आंध्रप्रदेश में लागू करने की योजना है जिसे भारत के अन्य राज्यो में भी लागू करने की जरुरत है।
यक़ीनन कानून और प्रसाशन महिला अपराध को कम कर सकते है मगर उनमे भी जागरूकता और स्वच्छ सोच की विकास की जरुरत है। और इस बात की भी जरुरत है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए जो संस्थाएं या कानून है उनकी निगरानी की जाये कि ये महिला अपराध को रोकने में अपनी क्या भूमिका निभा रहे है। अगर अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहे है तो आख़िर क्या वजह है जो महिला अपराध में वृद्धि दर्ज हो रही है। और ऐसी संस्थाएं भी बनायीं जाये जो महिलाओं के द्वारा दर्ज मामलों में पुलिस के द्वारा की जा रही कार्यवाहियों का समुचित आकलन कर सके और महिला को मिलने वाला न्याय और संतुष्टि का आँकड़ा प्रस्तुत कर सके ।
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