रचनाकार

गेहूँ का दाना…

(किशोर कुमार धनावत)


आटे की रोटी,
होती पतली मोटी,
भूख मिटाती।
जैसी बनालो,
तिकोनी और गोल,
स्वाद एक-सा।
राजा या रंक,
दोनों को ये चाहिए,
फरक नहीं।
जूठा गिराना,
बंद करना होगा,
अपमान है।
भूखा है कोई,
दो ग्रास तो मिलेगा,
पेट भरेगा।
अन्न से प्रेम,
कैसे किया जाता है,
सिखाना होगा।
एक प्रेरणा,
बनकर जगाओ,
इस जग को।
गेहूँ का दाना,
मोती से कम नहीं,
होता खजाना।
🙏🌹🙏🌹🙏
किशोर कुमार धनावत,
७-५-२०२१

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