“आजतक” न समझ सका, “रिपब्लिक भारत”
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
……हुनर होती कहां सब में,
जो पलट दे बाजी,
एक दांव पे,
हैं नेता ये,
तराशते हैं ये,
तलाशते है,
कलाकारी और कलाबाजी,
मौका परस्त की राजनीति,
में हुनरमंद हैं ये,
नजरबंद है ये,
इन्हें मतलब से है यारी,
न दर्द से है रिश्ता,
इनका समाज से,
तभी तो देखो,
“आजतक” न समझ सका,
“रिपब्लिक भारत”,
इन नेताओं के,
भेड़िया चाल को,
जाति धर्म के बाद,
खुद उलझ बैठी है,
मर्यादा, प्रेस की,
चौथा स्तंभ संविधान की।
