रचनाकार

आखिर कब तलक, बेटियां ऐसे शहीद होती रहेंगी

मेरी कलम से…

आनन्द कुमार

हैवान बना पुरूष,
एक गुड़िया की, इज्जत के साथ,
फिर तार-तार किया,
पार किया मानवता की,
सारे हदें।

कानून अपनी,
बुजदिली का आंसू रोता रहा,
स्ट्रेटजी बनाने में,
संविधान की आंख में,
धूल झोंकता रहा,

ऊपर से नीचे,
लखनऊ से दिल्ली,
अधिकारियों को,
भेजता रहा,
नित्य की नई रिपोर्ट,

लाचार, बेवस, बेजान पड़ी मनीषा,
कराहती रही, पुकारती रही,
खुद को बचाने के लिए,
बेजुबान होकर भी,
अपनी जिंदगी की भीख,
मांगती रही।

लेकिन यह क्या,
फिर वही हुआ,
जो होता आ रहा है,
बेखौफ़ इतनी धमकियों के बाद भी,
बलात्कारी जीता जा रहा है।

आखिर कब तलक,
चलेगा यह मंज़र,
कौन देगा आर्डर, जो सच हो,
उतार दो, ऐसे चेहरों में खंजर,

कब तक गुंगी बहरी,
बनी रहेगी, कानून की,
चाहरदीवारी,
कब निकलेगी,
गोला, बम व आग की चिंगारी।

आखिर कब तक,
ऐसे बेटियां शहीद होती रहेंगी,
कब तलक खाकी, खादी,
ऐसे ही कलंकित व शर्मशार,
होती रहेगी।

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