रचनाकार

ग़ज़ल : सोचता तो हूं मगर कैसे बनेगी बात यह खेत भी बच जाएं मेरे कारख़ाना भी बने

@ विजय वाजिद…

हर नज़र में भी रहे हुस्न-ए-ज़माना भी बने

हां मगर हर तीर का थे हम निशाना भी बने

इक शजर मैने लगाया है यही बस सोचकर
छाँव भी दे वो परिंदों का ठिकाना भी बने

चाहता हूं बा- हुनर हो इस जदीदी दौर में
सीख़ जाए दांव बेटा कुछ स्याना भी बने

सोचता तो हूं मगर कैसे बनेगी बात यह
खेत भी बच जाएं मेरे कारख़ाना भी बने

किस लिए चुप है ज़ुबां इस पर ज़माने की “विजय”
जो मुहब्बत की है हमने तो फ़साना भी बने

लेखक…

विजय वाजिद
लुधियाना ( पंजाब)
मो.नं. 9463354684

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