रचनाकार

फादर्स-डे : उम्मीद और आस की, पहचान है मेरे पिता

✍️ रोशनी जायसवाल…

1- उम्मीद और आस की, पहचान है मेरे पिता…

बरगद की गहरी छांव जैसे,
मेरे पिता।
जिंदगी की धूप में,
घने साये जैसे मेरे पिता।।

धरा पर ईश्वर का रूप है,
चुभती धूप में सहलाते,
मेरे पिता।
बच्चों संग मित्र बन खेलते,
उनको उपहार दिला कर,
खुशी देते।
बच्चों यूं ही मुस्कुराओं की
दुआ देते मेरे पिता।।

संकट में पतवार बन खड़े होते,
आश्रय स्थल जैसे है मेरे पिता।
बूंद बूंद सब को समेटते,
अंधेरी में देकर हौसला,
कहते मेरे पिता।।

तुम को किस का डर है,
गमों की भीड़ में,
हंसना सिखाते,
मेरे पिता।

और अपने दम पर,
तूफानों से लड़ना,
किसी के आगे तुम नहीं झुकना,
ये सीखलाते मेरे पिता।

परिवार की हिम्मत,
और विश्वास है,
उम्मीद और आस की,
पहचान है मेरे पिता।

2-

मेरा गर्व तुम्हारा ही गौरव है
बाबुल मोरे!…

बाबुल मोरे!
मैं धान की पौध
सींचा तुमने अपने पसीने से,
सजग रहने बचाया नन्ही,
कोंपलों को।

पानी में खड़े रहकर रोपा,
दूसरे खेत में,
देखा कि बहा न दे,
पानी का रेला,
नाजुक जड़ों को!

आज मजबूती से पैर जमाए,
लहलाती खेती-सी मैं!
लेकिन
भूली नहीं मैं
तुम्हारी पीठ पर बरसती
सर्दी, गर्मी, बरसात
तुम्हारे पैरों की गलन!

मेरा गर्व तुम्हारा ही गौरव है
बाबुल मोरे!

 

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