पिता के बिछड़ने पर बेटी के शब्द : व्याकुल मेरे नैना हैं

( वैदिका गुप्ता “चांदनी” )
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना है।
क्यों पल भर में साथ छोड़, दिव्य-ज्योति में लीन हुए
जिस बंधन में बांध के, हमने भावों को संजोया था
पल में वह बंधन टूट गया, हृदय मेरा बहुत रोया था
केवल यादों को साथ लिए, ये जीवन हमको जीना है।
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना है।
पिता जी आपके शुद्ध रक्त का ,अंश है हमारे रक्त में,
ये अंश ही तो व्याकुल है, मिलने को आपसे जीवन मे,
शब्दो मे बयान न हो सके, भाव है ऐसे मेरे मन मे,
भ्रम हमेसा रहता है, हर आहट पे आप के होने में,
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना है।
यह व्याकुल मेरा मन, धीरे धीरे आगे बढ़ता है
हर आहट पर हो आप, ऐसा मन को लगता है।
नित नैन आपको है ढूंढते, सपनो सा सब लगता है।
ये सपना कब टूटेगा, नित यही हर पल मन करता है।
मुझको जीवन दान देकर, आप स्वयं आयु से हीन हुए।
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना है।
माँ के सजल हृदय ने भी, साहस का पत्थर खोया है।
मस्तक का सिन्दूर उन्होंने, अपने ही हाथों धोया है।
उनके उदास चेहरे को देख, मन मेरा बहुत रोया है।
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना है।
ना कुछ सोचे-समझने का, अपने हमे वक्त दिया।
क्षण भर में साथ छोड़ अपने, मौन क्यों धारण किया।
कुछ पल ओर ठहर जाते, कर देते कन्यादान मेरा।
कितने सपनो को तोड़ अपने, हम सब से मुख मोड़ लिया।
प्रतिमा का आभास छोड़, आप पंचतत्व में लीन हुए।
पिता जी आपके बिछड़ने से, व्याकुल मेरे नैना हैं।

