कविता : मरें भूख से जीव तड़पते एक शाप है निर्धनता
@डॉ सरला सिंह स्निग्धा, दिल्ली जीवन कठिन हुआ पाषाणी तड़प रही देखो जनता। सिर पर छत अम्बर का उनके भाग्य
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@डॉ सरला सिंह स्निग्धा, दिल्ली जीवन कठिन हुआ पाषाणी तड़प रही देखो जनता। सिर पर छत अम्बर का उनके भाग्य
Read More•••• कलमकार •••• चुन्नू लाल गुप्ता-मऊ ✍️ उदण्ड को दण्ड कहां वह फांद ज़ाल को जाते हैं अक्सर निरीह
Read Moreशब्द मसीहा केदारनाथ… (Shabd masiha Kedarnath) घर में आई हुई ननद को भाभी ने बड़े ही प्यार से ग्यारह सौ
Read Moreशब्द मसीहा केदारनाथ… आज बाबू जी बहुत खुशी-खुशी घर लौटे थे। चेहरे पर दिनभर काम करने की थकान भी रोज
Read More@ शब्द मसीहा केदारनाथ… कुत्तों ने एक आक्रोश सभा का आयोजन किया। कुत्तों को अपने नाम से चलाये जाने वाले
Read More@ साहु रजनीश प्रकाश… मेरे पापा प्यारे पापा,याद आपकी आती है।आंखें मेरी भर आतीं हैं ,पापा क्युं हमें सताते हो।।
Read More@ शब्द मसीहा केदारनाथ… “अरे ओ …….. सब लोग जरा बाहर आओ ….इधर आओ। देखो तो सही तुम्हारी माँ को
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