कविता !! निरीह !!
•••• कलमकार ••••
चुन्नू लाल गुप्ता-मऊ ✍️
उदण्ड को दण्ड कहां वह
फांद ज़ाल को जाते हैं
अक्सर निरीह पशु पंक्षी
पड़ गफ़लत में फंस जाते हैं
शिकार,शिकारी के वश हो
निष्प्राण देंह हो जाते हैं
सिंह सियार लकड़बग्घे फिर
जमकर मौज़ मनाते हैं
बंदर भालू की निगरानी
सिंह कहां पर सहता है
जंगल में निर्द्विंद हनक
सत्ता में अपनी रहता है
झुंड शिकारी कुत्तों का भी
उनसे बचता रहता है
सारा जोर व दम-खम
उनका निरीह पशु पर रहता है
काट सके न ज़ाल वह ख़ुद से
दुखड़ा कहता रहता है
बनना न कभी निरीह पशु
वह हाथ जोड़ कर कहता है
महिला खिलाडियों के साथ सरकार का उपेक्षित रवैया ये दर्शाता है कि बृजभूषण शरण की सत्ता के गलियारों में हनक क्या है, कवि का दृष्टिकोण….


