Shabd masiha Kedarnath की लद्युकथा : ये घर मेरा भी है

शब्द मसीहा केदारनाथ…
(Shabd masiha Kedarnath)
घर में आई हुई ननद को भाभी ने बड़े ही प्यार से ग्यारह सौ रुपए का लिफाफा पकड़ाया। ननंद ने उसे अपने माथे से लगाया और भाभी से गले लगते हुए खुशी-खुशी उसे अपने पर्स में रख लिया।
“नंदा! बेटा इधर तो आ जरा।” माँ ने पुकारा।
” क्या हुआ माँ? अब तो मेरे जाने का वक्त है।” नंदा ने कहा।
“पता है, दामाद जी पहुंचने ही वाले हैं, लेकिन तू अपनी ससुराल में जाकर क्या कहेगी बेटा? यही कहेगी कि तेरे भाई भाभी ने तुझे सिर्फ ग्यारह सौ रुपए दिए हैं? तेरी तो नाक ही कट जाएगी.” माँ ने फुसफुसाते हुए कहा।
“ये क्या कह रही हो माँ? जो भैया भाभी ने मुझे दिया है, उसमें उनका प्यार छुपा हुआ है। मैं यहाँ पर सिर्फ प्यार के खातिर आई थी। भाभी ने मुझे एक बड़ी बहन की तरह प्यार किया है.। भैया की नौकरी जाने के बाद भी उन्होंने मुझे ग्यारह सौ दिए हैं, यह क्या कम है?” नंदा ने कहा।
“तू समझती नहीं है बेटा, इतने साल से तो नौकरी कर रहा था न, अब नौकरी चली गई है तो अपनी बहन को सिर्फ ग्यारह सौ रुपये दे रहा है। तुमने तो उसके बच्चों को न जाने क्या-क्या दिला दिया है। उसे तो बिल्कुल जैसे इस बात की चिंता ही नहीं है कि उसकी बहन के ससुराल में उसकी क्या इज्जत रह जाएगी। यह ग्यारह हजार रुपये हैं, इन्हें रख ले बेटा। अपनी सासू माँ से कह देना कि मुझे ग्यारह हजार शगुन दिया है। अपने लिए अच्छे कपड़े बनवा लेना बेटा।” माँ ने कहा।

“यह कैसी अजीब बात कर रही हो माँ? भैया भाभी ने जो मुझे प्यार किया है, वह तो अनमोल है। नौकरी जाने के बाद क्या हालत होती है ये मुझे बहुत अच्छी तरह पता है। भैया ने तो मुझे कभी नहीं बताया, लेकिन कल मुझे पता चल ही गया। भैया बच्चों को बाहर नहीं ले गए थे, इसलिए मैंने उन्हें खाना खिला दिया। भाभी ने जो साड़ी मुझे दी है भले ही आपके हिसाब से हल्की है, लेकिन उसका प्यार कितना भारी है ये आप नहीं समझ सकीं। बाबूजी के पेंशन के पैसे आप ही रखती हैं। भैया ने कभी आपसे नहीं कहा कि घर चलाने में दिक्कत आ रही है। माँ! तुम हम भाई-बहनों में भेद पैदा कर रही हो। जानती हो, भैया ने कितनी कोशिश करके मेरे लिए अच्छा रिश्ता ढूंढा, मेरी शादी में अपनी हैसियत से सारा खर्चा किया। सब को खुश रखने के लिए अपने आपको जैसे मिटा ही डाला। मेरी भाभी ने कभी इस बात के लिए भैया को नहीं रोका कि वह मुझे क्या दे रही हैं। अगर आज मैंने बच्चों को खुश करने के लिए थोड़ा बहुत कुछ कर भी लिया तो क्या हो गया? पैसे से प्यार की बराबरी नहीं की जा सकती। इन पैसों पर मुझसे ज्यादा हक इस समय भाभी का है, भैया का है। वह प्यार ही क्या जो पैसे के लिए किया जाय…. लेकिन माँ तुमने आज बहुत बड़ी गलती की है। तुमने हम भाई-बहन और भाभी के बीच में पैसे को अहमियत देकर हमारे रिश्तो को छोटा कर दिया है। सच कहूं माँ…. तो आज आपने अपने कद को छोटा कर लिया है। मैं आपके ये पैसे नहीं ले सकती…. इन पैसों पर मेरे भैया-भाभी का हक है, मेरे भतीजे-भतीजी का हक है।” नंदा ने कहा।
बाहर दरवाजे के पास खड़ी हुई उसकी भाभी का मन प्यार से चीत्कार उठा, आँखें नन्द की बातों को सुनकर छलछला उठीं और वह दौड़ते हुए अपनी ननंद नन्दा से जा लिपटी।
“क्या हुआ भाभी?” नंदा ने पूछा।
“आज तुमने ननंद और भाभी के रिश्ते को जो सम्मान दिया है, भाई-बहन के प्यार को जो मान दिया है, उसने सचमुच मुझे आज एक बहन दे दी है, वरना तो मैं अपने आप को अकेला ही समझती थी।” भाभी ने सुबकते हुए कहा।
“कैसी बात कर रही हो भाभी, तुमने और भैया ने तो मुझे अपने हाथों से विदा किया है। मैं जानती हूँ तुम्हारी आंखों में आए हुए आंसू रस्म अदायगी नहीं थे… वह सचमुच दिल से निकले हुए आंसू थे। तुम्हारे प्यार भरे सीने की गर्माहट और वह ममता मैं कैसे भुला सकती हूँ। मैंने अभी तुम्हें दीदी कहा…. यह तो सिर्फ सहेली होने के नाते से कहा…. सच तो यह है कि जो मैं माँ से भी नहीं कह सकती थी, वह मैंने तुमसे कहा। और तुमने मेरे प्यार को मुझे पाने में मदद की। मुझे पता है कि बाबूजी कि हर इच्छा का ख्याल करते हुए मेरे भैया ने भी अपने आगे-पीछे का कुछ नहीं सोचा। आज मैं भला कैसे तुम से पीछे रह जाऊं…. प्यार में तो हमेशा हाथ पकड़कर आगे बढ़ा जाता है… और तुमसे ज्यादा मेरे भैया को कौन जानता है, तुम्हारी जिद के आगे ही तो भैया ने अपने हथियार डाल दिए थे….. सच कहूं तो मेरी जिंदगी को जन्म देने वाली, तुम मेरी भाभी नहीं… मेरी माँ हो।” नंदा ने कहा।
तभी उसके पति सुमित ने मिठाई का डब्बा आगे बढ़ाते हुए कहा- ” तुम्हें नई माँ मिलने की खुशी में मिठाई हाजिर है।”
“अरे तुम कब आए?” नन्दा ने आश्चर्य से पूछा ।
“बस ये खुशखबरी की चिट्ठी लाने में देर हो गई। ये खुशी की चिट्ठी है …. भाई साहब की नई नौकरी की । मैं इस घर का दामाद हूँ ….दम निकालनेवाला नहीं ….दम भरने वाला। हम दोनों ही नहीं मिले हैं, बल्कि ये परिवार भी हमें मिला है। बड़े भैया के ऑफिस चला गया था जरा …. वहीं पता चला कि उनकी जॉब चली गई है। बस फिर क्या था , मैंने अपने बॉस से बात की ….और काम मिल गया। वैसे ऑफिस में भी मेरे बॉस हैं, उनके एक्सपीरियंस को देखते हुए सेलरी भी मुझसे ज्यादा है। शगुन तो ज्यादा मिलना ही चाहिए हमें ….हा हा हा।” सुमित ने कहा।
“क्या सचमुच इनकी नौकरी लग गई है ?” भाभी ने पूछा।
“और नहीं तो क्या, क्या आपने ये सोचा था कि शगुन के पैसे नहीं होने की वजह से वो बचकर निकल गए हैं ?” सुमित ने कहा।
“नहीं, ऐसा मैं कभी नहीं सोच सकती । मैं तो उन्हें जानती हूँ और उनके प्यार को भी। अपनी बहिन की विदाई पर वो यहाँ न हों, ऐसा कभी नहीं हो सकता।” भाभी ने कहा।
“सच कहा आपने, जानती हैं जो यहाँ से मिला है, वो हर शगुन से बड़ा है। जहाँ प्यार होता है, वहाँ कोई पनौती हो ही नहीं सकती।” सुमित ने कहा।
“बड़े खराब हो यार, मुझे ऑफिस में छोडकर भाग आए। इतना तो सब्र किया करो।”
“रिश्ते में तो आप हमारे साले लगते हैं , लेकिन अब बॉस कहना पड़ेगा …. अच्छा ही हुआ साले से तो बॉस बैटर है ….क्यों जानू?” सुमित ने नन्दा की तरफ देखते हुए कहा।
“बॉस के घर आकर बॉस की बहिन पर लाइन मार रहे हो ?” नन्दा ने कहा।
“जूनियर है, जूनियर को माफ किया ….हा हा हा।” कहते हुए उसने सुमित को बाहों में भर लिया।
“ये घर मेरा भी है, भाभी भी और भैया आप भी ।” कहते हुए नन्दा अपनी भाभी का हाथ खींचते हुए सुमित से लिपट गई।
शब्द मसीहा


बहुत ही सुंदर रचना
काश सबके विचार ऐसे ही होते तो किसी का भी घर घर नही स्वर्ग होता