रचनाकार

दहेज के रूप में आर्थिक डील हैं बेटियां ?

@ शालिनी सिन्हा…

उम्मीद करती हूं कि आने वाले सालों में दहेज का कोई मामला ना दिखे। लेकिन वास्तविकता यह है कि तक़रीबन हर धर्म में दहेज जैसी समस्याएं विद्यमान है। हद तो यह है कि कानून के दृष्टि में तो यह एक अपराध है किंतु सामाजिक दृष्टि में यह एक समझौता है। आज के दौर में भी दहेज के बढ़ते मामलों को देखने से यही प्रतीत होता है कि दहेज से संबंधित कानून को बना देने मात्र से यह पितृसत्तात्मक दहेज की सत्ता खत्म नहीं हो सकती। दहेज जैसी कुरीतियों के लिए पूरी सामाजिक संरचना जिम्मेदार है । एक तरफ कानून इसे गलत ठहराती है तो वहीं दूसरी तरफ दहेज लेने और देने वाले दोनों ही इसे अपना स्टेटस समझते हैं । दहेज देने वाला व्यक्ति अपने से पद और पैसे में ऊंचे व्यक्ति को इसलिए ज्यादा दहेज देता है ताकि उसकी बेटी सेटल हो जाए । इंजीनियर हो, डॉक्टर हो या सिविल सेवक सभी की अपनी – अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा है और इसी प्रतिष्ठा के मद्देनजर वर पक्ष को उचित दहेज देना सबको स्वीकार होता है। यही स्वीकारिता दहेज़ को समाज में खत्म करने की बजाए बढ़ा रही है। वर पक्ष और वधू पक्ष तबतक दहेज लेने और देने की शिकायत दर्ज नहीं करवाते जब तक कोई बड़ी दुर्घटना ना हो जाए । क्योंकि दहेज एक सामाजिक समझौता के तहत चलने वाली प्रक्रिया है जो पितृसत्तात्मक मानसिकता को बढ़ावा देती है। दहेज की प्रक्रिया को जड़ से खत्म करने के लिए नए युवकों में खुद से निर्णय लेने की क्षमता के विकास के साथ पितृसत्तात्मक मानसिकता को खत्म करने के प्रति संवेदनशील बनाना होगा। लड़कियों और लड़कों दोनों को समय-समय पर प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त करने की भी जरूरत है। जितना पैसा निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार दहेज़ में खर्च देते है उतने पैसे से अगर बेटियों को सशक्त कर दिया जाता तो यह समस्या भी धीरे – धीरे ख़त्म हो जाती। रही बात आजकल की शादियों में दिखावे और बर्बादियों की, तो यह सब अब व्यक्ति के विवेक और निजी रुचि के विषय को समझते हुए छोड़ देना ज़्यादा उचित होगा। इसका समाधान भी शिक्षा – कौशल और समझ बढ़ने के साथ हो जाएगा।
महिलाओं को दहेज के रूप में आर्थिक डील समझा जाता है और इसलिए उसका शोषण भी कई हद तक बढ़ जाता है। अब इस सोच को भी बदले जाने की जरूरत है। जब एक महिला की शादी होती है तो वह न सिर्फ अपना घर छोड़ती है बल्कि अपने सारे रिश्तेदार दोस्त,परिवार और अपना परिवेश यानि सबकुछ जो भी उसकी जवानी तक उससे जुड़ा हुआ होता है सब छोड़ देती है । नया घर ही यह तय करता है कि उसके दोस्त और रिश्तेदार कौन होंगे? उसको आर्थिक स्वतंत्रता कब मिलेगी या नहीं मिलेगी । वह आगे की पढ़ाई या नौकरी जारी रखेगी या नहीं, यह भी नया परिवार तय करता है। यहां तक कि वह अपने मां-बाप भाई – बहन से कितने देर तक बातें कर सकती है यह समयसीमा भी नया परिवार जाने – अनजाने तय कर ही देता है । वह किस रंग के कपड़े पहनेगी और क्या पहनेगी , क्या खायेगी और क्या पकाएगी, यह भी नया परिवार ही तय करता है।
मतलब साफ है कि लड़कियों की संपूर्ण आज़ादी और बाकी बचा जीवन उसका नया परिवार तय करता है। इस बीच कभी – कभी वह शायद अपने खुद को भूल जाती है। लड़कियां कभी कभी ऐसे इकोसिस्टम में रहने को विवश हो जाती है जिसको न वह चुनती है और ना ही समझती है । दूसरे घर के इकोसिस्टम को अपना कर सदा – सदा के लिए लड़कियां जैसे- तैसे अपना पूरा जीवन काट भी लेती हैं । और विडंबना तो यह है कि उसकी सार्थकता भी समाज को नजर नहीं आती।
कुछ दिन आप घर से दूर रहकर देखिए आपको अपने घर की याद सताने लगेगी। ऐसे में जरा सोचिए भला उस लड़की पर क्या गुजरती होगी , जो अपना सब कुछ छोड़कर सदा के लिए आपके घर की शोभा बढ़ाती है। क्या कभी कोई इससे बड़ा भी त्याग का उदाहरण होगा लड़कों की जिंदगी में?
अगर यह मुमकिन नहीं तो कम से कम दहेज देकर और लेकर लड़कियों की जिंदगी को और दूभर ना करें।

संक्षिप्त परिचय
शालिनी सिन्हा (मुक्त लेखिका)
विश्व रिकॉर्ड ( सबसे अधिक विविध साहित्यिक एवं पत्रकारिता रूपों वाली सबसे कम उम्र की महिला लेखिका – Youngest Female Writer with Most Diverse Literary and Journalistic Forms)
राष्ट्रीय रिकार्ड ( Most Prolific author in multiple catagories)
पूर्व अनुसंधान सहायिका
(केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान,लखनऊ)
गेस्ट फैकल्टी
(एज़ाज़ रिज़्वी कॉलेज ऑफ जॉर्नलिज्म)
स्थानीय संपादक
(नॉर्थ इंडिया टाइम्स)
प्रबंध अधिकारी
(शहरी खेती एवम निरंतरता संस्थान)
मुक्त लेखिका एवम ऑथर

 

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