खास-मेहमान

शब्द मसीहा की कहानी : हवाई रिश्ते

दरवाजे की घंटी बजी तो अलका के शरीर में कुछ हरकत हुई । उसने सामने लगे सी. सी. टी. वी. पर नजर टिकाई। कोई नवेला सा जोड़ा खड़ा था। फिर मन ही मन सोचा कि अभी तो दिन है, आगंतुक को आने देते हैं। उसने रिमोट से दरवाजा खोल दिया। कुछ देर बाद जोड़ा कमरे में दाखिल हुआ।

“अलका दी ! नमस्ते …मैं राजेश हूँ।” वह युवक बोला।

“नमस्ते ! बुआ जी।” साथ आई राजेश की पत्नी ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

अलका तो अभी तक पहचान नहीं पा रही थी कि ये आगंतुक कौन हैं और वह इस लड़की की बुआ कैसे हो गयी. जबकि उसकी बेटी और बेटा दोनों ही विदेश में हैं।

“भाई ! माफ़ करना। मेरी याददाश्त जरा कमजोर हो गयी है। कम पहचान पाती हूँ आजकल। ” अलका बोली।

“हा हा हा …ये भी खूब मजाक रहा दीदी. हमें बोला कि घर आ जाओ और अब पहचान भी नहीं रही हो। ” राजेश ने अपने हाथ से मिठाई का डिब्बा अलका को थमाते हुए कहा।

“हा हा हा …लेकिन भाई ! मैं सच में नहीं पहचान सकी तुम्हें।”

“दीदी ! मैं राजेश सैनी हूँ और ये मेरी पत्नी रचना है। परसों ही तो फेसबुक पर बात की थी कि हम दिल्ली आ रहे हैं। ” राजेश बोला .

“ओह ! अब याद आया। अरे ! इधर आ भाई !” और उन्होंने राजेश का हाथ खींचकर उसे अपने सीने से लगा लिया।

“ओहो ! बीबी तो बहुत सुन्दर है तेरी, पटाखा है …हा हा हा।” रचना तो शर्म से लाल हो गयी और अपने पति पर खीज भी रही थी कि कहाँ अनजान जगह ले आया वह उसको।

“बुआ जी ! कैसी हैं आप ?”

“ओये ! ये बुआ जी क्या होता है ? आई एम् यंग गर्ल ऑफ़ सेवेंटी टू …फ्रेंड बोलो बेटे …हा हा हा।”

“देख लो ! मैंने कहा था न …ज़िन्दगी जीना सीखना है तो दीदी से सीखो !” राजेश बोला।

“ओये भाई ! ये मिठाई क्यों लाया ? तुझे पता है न …मैं अकेली बुढिया हूँ। निकालो इसे और खाना शुरू करो। रचना बेटी ! वो सामने रसोई है सब के लिए चाय बना लो। मैं तो इतनी मोटी हो गयी हूँ कि बना के नहीं पिला सकती और ये टांग भी ससुरी धोखा दे रही है।” रचना रसोई में चली गयी और चाय बनाकर ले आई।

“अहा ! यार तेरी बीबी चाय भी बढ़िया बनाती है …डबल मजे हैं तेरे।” और उनको भी चाय लेने का इशारा किया।

एक घंटे तक आपस में बातें होती रहीं।

“राजेश ! बेटा ….बहुत अच्छा किया तुम लोग आ गए । कई दिनों से बाहर जाना भी नहीं हो पाया था। यूँ भी हम बूढों को पूछता कौन है। पैसे ही सब कुछ नहीं होते। पैसों का क्या अचार डालूँ जब कोई खर्च करने वाला ही नहीं है। यार ! तुम फेसबुक की दोस्ती निभाने आये हो …और …..” अलका की आँखों में आंसू भर आये।

“क्या दीदी आप भी न ….ये अच्छा लगता है क्या ?” राजेश बोला।

“अरे! नहीं भाई ! ये तो ख़ुशी के आँसू हैं …आज दो रोटी फालतू खाऊँगी मैं …मेरा भाई और उसकी बीबी जो आई है। रचना वो सामने वाली अलमारी से पर्स तो दे जरा।” अलका बोली।

“लो बेटी ! तुम पहली बार आई हो मेरे घर। फिर मिलूँ न मिलूँ ।” और दो हजार का नोट उन्होंने रचना के हाथ में रख दिया।

“पर ये तो बहुत ज्यादा है …”

“चुप कर …बहुत ज्यादा हैं . तेरा प्यार क्या किसी से कम है। मेरे भाई को खुश रखना आर खुश रहना। आते रहना …अपना ही घर समझकर।” और रचना का माथा चूम लिया ।

राजेश हवाई रिश्तों को साकार होते हुए देख आँखों में पानी भर लाया था।

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