एनबीएआईएम ने आयोजित किया एक दिवसीय सूक्ष्मजीव आधारित कृषि पद्धतियों की उपादेयता व योगदान विषयक कार्यशाला
मऊ। जनपद के ग्राम- सादीपुर में सूक्ष्मजीव आधारित कृषि पद्धतियों की उपादेयता एवं योगदान विषयक एक दिवसीय कार्यशाला शुुुक्रवार को राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, कुशमौर, मऊ के तत्वाधान में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित DST-SSTP परियोजना के कार्य-कलापों के अंतर्गत कृषक प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सादीपुर में आयोजित इस कृषक प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन कार्यक्रम के माध्यम में गाँव के 110 से अधिक किसानों, जिनमें महिलाओं की भागीदारी 40 प्रतिशत थी, को फसल उत्पादन हेतु खेती में प्रचलित परंपरागत रासायनिक गतिविधियों से अलग हटकर सूक्ष्मजीवों और अन्य जैविक तरीकों के उपयोग पर विशेष जोर देते हुए इस पद्धतियों को अपनाए जाने हेतु ब्यूरो के वैज्ञानिकों के द्वारा कृषक संपर्क, विचार विनिमय तथा लाभों पर चर्चा की गयी. यह कार्यक्रम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के वित्त-पोषण के अंतर्गत ब्यूरो के प्रधान वैज्ञानिक डॉ रेनू के नेतृत्व में मऊ जनपद में संचालित किया जा रहा है। जिसमें ब्यूरो की प्रधान वैज्ञानिक डॉ पवन कुमार शर्मा एवं वैज्ञानिक डॉ प्रमोद साहू की भी सहभागिता है। डॉ पवन कुमार शर्मा ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से ब्यूरो में 6000 से अधिक कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीवों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया गया हैऔर उनमें से कतिपय जीवों कीव्यापक रूप से उपयोगिता को देखते हुए उनके अनुकल्प भी तैयार कर लिए गए हैं, जो आज किसानों तक पहुँचाये जा रहे हैं जिससे पिछले वर्ष इन्ही सूक्ष्मजीवों के उपयोग से जनपद ही नहीं वरन आसपास के जनपदों के कई किसानों ने रासायनिक खादों के उपयोग में 25 से 30 प्रतिशत की कटौती करने में सफलता प्राप्त की है। परियोजना के प्रभारी डॉ रेनू ने बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यही है की जनपद के किसान धीरे धीरे ही सही पर रसायन-आधारित कृषि पद्धतियों से हटें और बदले में सूक्ष्मजीव और अन्य पौध-उत्पादों पर आधारित खेती के उपायों को आत्मसात करें जिससे कृत्रिम रसायनों के अधिकाधि उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सके. परंपरागत कृषि रसायन आधारित खेती के तौर-तरीकों में बदलाव वर्त्तमान में अत्यधिक वांछित है. इसका प्रमुख कारण कृषि रसायनों के व्यापक और अत्यधिक उपयोग से न केवल खेतों की दशा का ख़राब होना है। बल्कि इन रसायनों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर घटक दुष्परिणाम भी दिखने होने लगे हैं. उनके के अनुसार इन समस्याओं के समूल निराकरण के रूप में सूक्ष्मजीव, गुणवत्तायुक्त कम्पोस्ट और पौध-आधारित प्राकृतिक तत्व अनुकल्पों के रूप में अब किसानों के सामने कई विकल्प उपलब्ध हैं. इन विकल्पों को चिन्हित करने, अपनाने और खेती की पद्धतियों में इन उत्पादों को स्थान देने की जिसके माध्यम से कृषि रसायनों से काफी हद तक छुटकारा मिल सकेगा और साथ ही जैविक कृषि की ओर कदम बढाया जा सके।
इस परियोजना के मूल में सूक्ष्मजीव आधारित फसल उत्पादन पद्धतियों के समावेशन और अंगीकरण पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम के माध्यम से किसानों में जागरूकता को बढ़ावा दिया जाना है। किसानों को विभिन्न प्रकार के अनुकल्प, तकनीकी पुस्तिका आदि प्रदान की गयी जिसके माध्यम से सूक्ष्मजीवों के उपयोगी पहलुओं को समझा जा सके. डॉ प्रमोद साहू ने बताया की हम न केवल इन पद्धतियों के तकनीकी और व्यवहारिक पहलुओं को किसानो के बीच में प्रसारित कर रहे हैं बल्कि इन तकनीकियों को बारीकी से उनके सामने सजीव रूप से करते हुए प्रदर्शित भी कर रहे हैं. इसी कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों के खेतों में ही प्रतिभागी किसानों के समक्ष बीज, जड़ और मृदा शोधन के प्रयोगों को प्रदर्शित करने के साथ ही मिट्टी में इन जीवों से संपोषित कम्पोस्ट का भी प्रयोग भी करके दिखाया. प्रायः बीज-उपचार के समय एक बार ही उपयोग किये जाने वाले सूक्ष्मजीव अनुकल्पों को फसल की महत्वपूर्ण विभिन्न अवस्थावों के दौरान भी प्रयोग किये जाने के विषय में भी व्यापक रूप से प्रदर्शन प्रदान किया गया जिससे इंटरैक्टिव लर्निंग के माध्यम से किसान इन पद्धतियों को आत्मसात कर सकें. प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ ही चयनित गाँव के कतिपय उन्नत एवं प्रगतिशील किसानों के खेतों पर प्रायोगिक रूप से सूक्ष्मजीव शोधित बीजों की बुवाई से लेकर कटाई तक की निगरानी की भी योजना है जिसके माध्यम से किसानों के खेतों से ही पौधों और और मिट्टी से प्राप्त डाटा का विश्लेषण करके सूक्ष्मजीव और इन पद्धतियों के बारम्बार उपयोग से फसलों पर पड़ने वाले लाभकारी प्रभावों का अध्ययन किया जा सके। इस मौके पर उपस्थित भारतीय गन्ना अनुसन्धान के पादप रोग वैज्ञानिक डॉ संजय गोस्वामी ने जैव नियंत्रकों के उपयोगों के बारे में किसानो को जानकारी दी और किसानों के खेतों में लगने वाले कई रोगों के निदान बताये। ब्यूरो में शोध अध्येता डॉ. विवेक सिंह, डॉ सुधीर यादव, डॉ आशीष विश्वकर्मा व और परियोजना से जुड़े शोध सहयोगियों पूजा यादव, राजन सिंह, आस्था तिवारी, रामअवध , जगनारायण, रबिन्द्र, हरिओम, बबलू आदि की विशेष भूमिका रही।

