काम की बात

मोदी जी, सत्ता की चिंता बाद में कीजिए, पहले अटल जी के शब्दों में राजधर्म निभाइए

सेवा में,
श्री Narendra Modi जी
(प्रधानमंत्री, भारत)

विषय : जन के मन की बात

प्रधानमंत्री जी!

भारत के एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों में से एक का प्रणाम स्वीकार कीजिए। आपके नाम के साथ “प्रिय” लगाना चाहता था, पर मन ने इसे स्वीकार नहीं किया। यह मत समझिएगा कि मैं आपका विरोधी या देशद्रोही हूँ। मैं वही हूँ जिसके लिए आप 2013 से कई वर्षों तक एक हीरो जैसे रहे हैं, जिसकी हर बात आपकी तारीफ से शुरू होती थी। लेकिन अब मैं उन करोड़ों भारतीयों में हूँ जिनके लिए आपका प्रधानमंत्री होना अब कोई अधिक फर्क नहीं डालता; जो न अब आपके भाषण सुनना चाहते हैं और न आपकी तारीफ या बुराई।

सच कहूँ तो यह एक दिन में नहीं हुआ। यह तब हुआ जब हमने कई बार (नोटबंदी से कोविड काल तक) देश और अपनों को टूटते देखा। और इस पर अंतिम मुहर तब लगी जब आपकी सरकार ने उसी संसद में, जिसे आप लोकतंत्र का मंदिर कहते थे, सदी का सबसे बड़ा झूठ बोला—
“कोविड में ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा।”

उसके बाद हमने बार-बार जाना कि आपके लिए देश नहीं, सत्ता, शक्ति, पार्टी और व्यापारी पहले हैं। उसके बाद से आप हमारे लिए केवल प्रधानमंत्री हैं और हम केवल आपको चुनने वाले महज एक वोट .

प्रधानमंत्री जी! देश के ताजा हालात यह हैं कि जब आप केरल में अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार—जिसके लिए हमारे टैक्स के पैसे से उड़ने वाले जहाज को एक अनाम-सी रेल के उद्घाटन के नाम पर ले गए थे—और असम में थे, बता रहे थे कि कांग्रेस के नेता देश को भड़का रहे हैं। केरल में कह रहे थे
“मैंने केरल का नाम केरलम रख दिया है, मुझे वोट दो।”

उस दौरान देश की जनता फिर से लाइन में है। ठीक वैसी ही लाइन, जैसी नोटबंदी के समय बैंक के बाहर, कोविड के समय ऑक्सीजन प्लांट, अस्पताल और श्मशान के बाहर थी।

लेकिन आपको परेशान होने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि इस लाइन में आपका कोई भी उद्योगपति मित्र, आपका सांसद, विधायक, मंत्री या डी.एम. नहीं है। इसमें बस वही जनता है जिसने आपको चुना है। वही जनता जिसे बड़ी आसानी से आपके प्रवक्ता, पत्रकार और समर्थक “जल्दबाज” या “पैनिक हो जाने वाली” बताकर सारा दोष उसी पर डाल देंगे। और फिर आपकी सरकार एक दिन संसद में खड़े होकर बयान दे देगी कि देश में किसी के घर का चूल्हा गैस की कमी से नहीं बुझा। और उसे कभी जवाब नहीं देना होगा कि किसी मासूम का दूध क्यों गर्म नहीं हुआ, किसी बुजुर्ग बाप की खिचड़ी क्यों अधपकी रह गई।

आपके समर्थक अभी दो बातें कहेंगे एक तो देश में कोई ऐसा गैस संकट नहीं है और अगर है भी तो इसके लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार नहीं हैं। वे बड़ी आसानी से लाइन में लगे जिंदा सबूतों को झुठला देंगे और बता देंगे कि यह तो वैश्विक संकट है। तो अगर यह वैश्विक संकट है तो आपका झूठ क्यों? और यदि वर्षों से तय था कि ऐसा संकट आ सकता है, तो आपकी तैयारियाँ क्या थीं?

जब युद्ध शुरू होने से चंद घंटे पहले आप इज़रायल में खड़े होकर उसे “फादरलैंड” बता रहे थे, तो क्या आपको सच में नहीं पता था कि चंद घंटों बाद क्या होने वाला है? अगर हाँ, तो आप वहाँ क्यों थे? और अगर नहीं, तो विश्वगुरु, महामानव जैसे तमगे आप उसी खूंटी पर क्यों नहीं टांग देते जिस पर मोहरा बनने की एवज में इज़रायल से मिला सम्मान टंगा हो?

प्रधानमंत्री जी! जब देश धीरे-धीरे संकट में जा रहा है, तब आप संसद से लेकर संवाद तक से वैसे ही गायब हैं जैसे पुलवामा हमले के समय, दिल्ली विस्फोट के समय, कोविड की मौतों के समय। खैर, जुमलों और नारों की सत्ता समझ हम आपका जायज होना मान लेते हैं, लेकिन बस इतना कर लीजिए कि सच स्वीकार कीजिए। कुछ दिनों के लिए कांग्रेस और नेहरू की गलतियों और बातों को छोड़ दीजिए और कह दीजिए कि जनता को—स्थितियाँ गंभीर हो चली हैं, आइए साथ मिलकर लड़ते हैं।

और यकीन जानिए, 12 साल तक देश में नफरत की खेती होने के बाद भी इस देश में अभी इतना कुछ बचा है कि वह संकट के इन पलों में एक हो जाएगा। किसी के घर का चूल्हा ठंडा नहीं होगा, किसी का बच्चा भूखा नहीं सोएगा। क्योंकि अमेरिका हो या कोई भी बड़ा देश, वह हमारे प्रधानमंत्री को आदेश दे सकता है, अनुदान दे सकता है; लेकिन राम, कृष्ण, बुद्ध, गांधी और कलाम के देश में जनता के लिए मानवता ही सबसे बड़ा आदेश है।

प्रधानमंत्री जी,
इतिहास में सत्ता से बड़े कई लोग हुए हैं और कई कुर्सियाँ समय के साथ बदल गईं। पर जो नहीं बदला, वह है जनता की स्मृति और उसका न्याय। इसलिए आज भी इस देश का एक साधारण नागरिक आपसे बस यही कह रहा है सत्ता की चिंता बाद में कीजिए, पहले अटल जी के शब्दों में राजधर्म निभाइए। क्योंकि सत्ता समय देती है, लेकिन इतिहास फैसला देता है।

धन्यवाद।

आपके देश का ही एक नागरिक
मृदुल कपिल
( 14.03.2026 )

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