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मैं “आनन्द” ही रहूँ, तुम “अजहर” ही रहो

मेरी कलम से…

आनन्द कुमार 

चलो आओ लगा दें आग,
मन में फालतू के खुराफात की।
चलो आओ कर लें सम्मान,
धर्म और शास्त्र का,
फैसला आने को है,
तो आने दो ना,
चलो कर लें अभिमान,
अपने आत्म और सम्मान का।
जब अदालत को मान लिया है,
हमने-तुमने न्याय का मंदिर,
तो चलो कर लें स्वीकार,
अयोध्या पर इंसाफ का।
क्यों परेशान है शासन व प्रशासन,
हमारे-तुम्हारे भीतर छुपे मन भाव से,
आओ कर दें गर्जना,
हमें फिक्र है अपने धर्मार्थ की।
चलो आओ लगा दे आग,
मन में फालतू के खुराफात की।
दुश्मन देश के अंग्रेज थे,
तो हिन्दू-मुस्लिम में बैर कैसा,
आओ कर दें गर्जना,
सर्वधर्म सम्भाव की।
फैसला जो भी आये,
आने दो देख लेंगें।
या तो उसपर झुक लेंगें,
या तो उसको चूम लेंगें
रोज करते हैं हम-तुम,
बात प्रेम भाईचार की।
आज वक्त है दिखला दो,
गंगा-यमुनी तहजीब,
विश्व के हर इंसान को।
डर रहा है शासन-प्रशासन तो डरे,
हम नहीं डरेंगे, अपने किरदार से,
मैं “आनन्द” ही रहूँ,
तुम “अजहर” ही रहो,
“मंदिर” बने तो तुम साथ चलो,
“मस्जिद” बने तो मैं साथ चलूँ।
आओ कर लें शेष जीवन का,
पुण्य कर्म में कुछ इस्तेमाल।
दे नई पीढ़ी को नये भारत का,
“सोने की चिड़िया” सा सौगात।
काँप जाये विश्व का हर रहनुमा,
जो भारत पर नजर टेढ़ी रखे,
सोचे बस वह, कैसे इंसान हैं हम,
आखिर किस मिट्टी के बने।।

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