सही बर्ताव, संवेदनशीलता और उचित कार्यवाही — पुलिसिंग का नया मंत्र
० ‘ख़ाकी’ में ‘विश्वास’ पुलिसिंग में सुधार से ही संभव
@ शालिनी सिन्हा
एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में यह कहते हैं कि “पुलिस की जनधारणा में बदलाव की तत्काल आवश्यकता है”, वहीं दूसरी ओर जालंधर की घटना पुलिस की लापरवाही, देरी, अधूरी जांच और अव्यवस्थित कार्रवाई की ओर गंभीर संकेत देती है। यह कोई पहली घटना नहीं है—पुलिस की लापरवाही के कारण जनआक्रोश अक्सर सामने आता रहा है। कई मामलों में अपराधी न तो समय पर पकड़े जाते हैं और न ही उन्हें उचित दंड मिल पाता है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन्ना ने कहा था:
“मानवाधिकारों और शारीरिक अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा पुलिस थानों में होता है। हिरासत में यातना और पुलिस अत्याचार आज भी एक वास्तविकता हैं।”
इस कथन से स्पष्ट है कि थाने में कदम रखते ही व्यक्ति अपनी गरिमा खो बैठने का डर महसूस करता है। रिपोर्ट लिखवाने आए लोगों के साथ कई बार रूखा व्यवहार, अपमानजनक भाषा, अनावश्यक पूछताछ और मानसिक दबाव बनाया जाता है — यह संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि थाने में आने वाला हर व्यक्ति अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण व्यवहार का अधिकारी है।
समस्या केवल पुलिस नहीं—व्यवस्था भी जिम्मेदार है
पुलिस थानों की दयनीय स्थिति, संसाधनों की कमी, लंबी ड्यूटी, मानसिक दबाव और अव्यवस्थित कार्य संस्कृति भी पुलिस के व्यवहार और दक्षता को प्रभावित करती है। ऐसे में अपेक्षित संतुलित, सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील policing करना कठिन हो जाता है।
फिर भी जनता, पुलिस से शिष्टता, संवेदनशीलता और सेवा की उम्मीद रखना पूरी तरह वाजिब है।
नियुक्ति प्रणाली में सुधार की आवश्यकता
IAS/IPS जैसी उच्च सेवाओं में साक्षात्कार के अंकों के आधार पर पद-आवंटन के कारण कई अभ्यर्थी अपनी पसंद के विपरीत पदों पर चले जाते हैं। इससे असंतुष्टि और नवाचार की कमी दिखाई देती है।
ज़रूरी है कि IPS को पहली पसंद रखने वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता मिले और उनके नवाचारी विचारों को व्यवहार में लाने का अवसर दिया जाए।
सामुदायिक पुलिसिंग — जनविश्वास बढ़ाने का रास्ता
पुलिस यदि समुदाय के बीच मासिक बैठकें, जागरूकता कार्यक्रम, स्कूल-गांव संवाद और जनसहभागिता बढ़ाए, तो नकारात्मक छवि स्वतः कम होगी।
समस्या यह भी है कि योग्य, कुशल और प्रशिक्षित अधिकारियों को अक्सर विशेष सुरक्षा या उच्च पदों पर तैनात कर दिया जाता है, जबकि थानों में प्रशिक्षित व आधुनिक ज्ञान वाले कर्मियों की कमी रहती है। इससे अपराधी कई मामलों में पुलिस से अधिक तकनीकी रूप से दक्ष दिखते हैं।
परिवर्तन का समय — तकनीक, प्रशिक्षण और मानवता
तकनीकी प्रशिक्षण, आधुनिक जांच विधि, जनसहयोग, पारदर्शिता और संवेदनशील व्यवहार पुलिसिंग में नया अध्याय खोल सकते हैं। इसके लिए बड़े बदलाव का इंतजार नहीं—पुलिस अपने स्तर पर भी सकारात्मक रवैया अपनाकर जनता का विश्वास पुनः जीत सकती है।

