क्या देखा है कभी तांडव तूने?
मऊ के युवा लेखक ‘दिव्य’ की रचना
उबले रक्त जब धमनियों में,
भौहें सिकूड़े, क्रोध माथे को थामें,
कंठ ध्वनि जब ज्वार लावा बरसाए,
हर कदम शत्रु के भय को कई गुना कर ,
यह तो अभी तांडव का अविर्भाव कहलाये।

छल, कपट और ठगी विपक्षी पहचान बतलाये,
बदन की रंगत विपट आग सी बन जाए,
खौफ़नाक मंजर कालकूट नजर आए,
वात कुछ यूं विद्युत सा बदन घेरे,
सारंग का हलाहल नेत्र में उतर जाए।
कुछ यूं तांडव अविर्भाव दिखलाये।

छली बुद्धि ही भय कारक बन जाए।
हर कदम शत्रु के अंदर आतंक का भय जगाये,
अगड़ित सुत, सुता क्षण भर भी काम ना आए,
हर कदम शत्रु के उत्कर्ष को उज्जङ कर जाए,
तांडव आभा शत्रु नेत्र अधियार कर जाए,
धर्मराज, दण्डधर रूप दिखाए।
कुछ यूं तांडव आरम्भ दिखाए।
कुछ यूं तांडव आरम्भ दिखाए।
Divy.


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