पिता होने का मूल्य…

( मनीष गंगा )

एक अनकहा भगवान जो अपनी मोहब्बत बारिश की तरह लुटाता हैं, और अपना गुस्सा धूप की तरह बरसाता हैं,
उसे जानने को तो हमने एक शब्द दे दिया हैं, इक पहचान दे दी हैं “पिता”; पर उसको समझना शायद किसी को आता नहीं हैं,
परेशानियों की लकीरें चेहरे पर उसके देखी नहीं होती कभी । जब होती भी हैं तो वो तब, जब वो एक बेटे में रूप में होता है, तब होती हैं,
वो चाहता हैं, तुम्हें उससे भी बेहतर होते देखना, वो अपने सपने तुममें जीने की कोशिश मात्र करता है, और तुम्हारे सपनो से कब अपने सपने कुचल देता हैं , पता ही नहीं पड़ता, जब वो तुम्हें अनजान जगह जाने पर टोकता हैं, ग़लत संगत का हवाला देता हैं, तब वो तुम्हें तानाशाह और क्रूर नजर आता है,
तुम्हें तो पता ही नहीं जब तुम ग़लत होते हो तो तुम्हारे लिए संसार के सामने झुक जाता हैं , पर जब तुम सही हो औऱ फ़िर भी कोई मुसीबत में हो तो वो तुम्हारे आगे चट्टान की माफ़िक खड़ा होता हैं, ताकि क़ोई आँच ना आये तुम्हें ,
तुम जब दिनभर माँ के आँचल में रहते थे, वो तुम्हारे पल-पल की ख़बर रखता था, कि तुम किस कदर शरारतें करते हो ,
वो तुम्हें सीने से लगाकर सारी दुनियाभर का सुकूँ पा लेता था ,
तुम्हारी एक मुस्कुराहट के लिए वो दौड़ता भागता काम ख़त्म कर समय पर घर को आ जाता हैं, पर
वो जिम्मेदारियों को निभाते निभाते कब उम्र की ढलान पर आने लगता हैं पता ही नहीं पड़ता, पर उनका तज़ुर्बा हमेशा तुम्हारे काम ही आता होगा इसमें कोई संदेह नहीं हैं ,

अपने जीवन की सारी पूँजी तुम्हारे विवाह को शानदार बनाने में लगा देता हैं, और उस वक़्त भी उनके चेहरे की ख़ुशी महसूस करने लायक़ नहीं और नहीं देखने लायक़ होती हैं, क्योंकि महसूस तो तुम तब ही कर सकते हैं , जब तुम स्वयं पिता हो जाओगे ।

हजारों लोग माँ की “ममता” पर क़सीदे पढ़ते हैं, और पिता के “त्याग” पर, पर क्या पिता के दिल में ममता नहीं हो सकती?
उस ऊपर वाले ने अगर माँ बनाई हैं तो पिता भी कुछ सोच समझकर ही बनाया होगा ना ।

वो कहते हैं जब हमारा पेट पूरी तरह से भरा हो तो 56 पकवान भी हमारी जीभ नहीं ललचा सकते तो फ़िर
जब तुम माँ के ममत्व रूपी प्यार से मन भर लेते हो तो पिता का प्यार तुम्हें नज़र कहाँ आयेगा , वो तो तुच्छ सा लगेगा, पूरा फ़र्जी या फ़िर तुम उस प्यार को उनका फ़र्ज़ या कर्तव्य बोल दोगे ।

कहते है, जो पवन के वेग को काट दे, जो रुद्र का कोप झेल जाये वो होता हैं पिता ।

बात जब संतान हित की आती हैं तो वही पुरूष खुद में पिता को देखता हैं, और तुम्हारे दोषी होने या फ़िर तुम्हारी लाख ग़लतियों के बावजूद उस वक़्त उससे बेहतर न्यायधीश कोई हो ही नहीं सकता क्योंकि वो तुम्हारे अक्षम्य अपराध भी माफ कर देता हैं ।

कहतें हैं
मैं किताब का इक पन्ना हूँ ।
मेरे पिता पूरी किताब हैं ।

पिता सिर्फ़ नाम नहीं होता ,
छोटा मोटा इंसान नहीं होता ,
होता हैं वो खुदा से बड़ा ,
उससे बड़ा कोई भगवान नहीं होता ।

लेखक
मनीष गंगा
म.नो 8878940271
इंदौर

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