जयप्रकाश शाही और मनोज श्रीवास्तव जिनका नाम ही ब्रांड था
-धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव…
याद हैं न आदरणीय भाई जय प्रकाश शाही
याद हैं न आदरणीय भाई मनोज श्रीवास्तव
नहीं याद हैं तो कर लीजिए.
लखनऊ के दो ऐसे पत्रकार
जो अपने अपने समय में हिन्दी पत्रकारिता की रिपोर्टिंग विधा की जान थे.
दोनों क़ी आदत में था जो कल होना है, उसे आज ही लिखना और इतना सटीक लिखना कि कोई इनकार नहीं कर सके.
दोनों शाम- ए- अवध का सम्मान करते थे. दोनों उसे जीते भी थे.
दोनों शेरो- शायरी के प्रेमी. दोनों हिन्दी के बड़े समूहों से जुड़े रहे. दोनों से मेरी भी दुआ सलाम थी.
इन दो में एक थे, जयप्रकाश शाही. मैंने कभी उन्हें यह बोलते नहीं सुना कि मैं अमुक अख़बार से जयप्रकाश बोल रहा हूँ. वह बोलते थे, मैं जयप्रकाश.
सामने वाला समझ जाता था जयप्रकाश शाही. कभी जनसत्ता वाले, कभी दैनिक जागरण वाले, कभी स्वतंत्र भारत वाले. कभी हिन्दुस्तान वाले.
विकट स्थितियों में भी हँसने वाले जयप्रकाश शाही को एक सड़क हादसे ने हम लोगों से छीन लिया.
फोन या मोबाइल पर मनोज श्रीवास्तव भी कभी संस्थान का नाम नहीं लेते थे. वह बोलते थे सिर्फ मनोज. सामने वाला समझ जाता था अमर उजाला वाले मनोज श्रीवास्तव, दैनिक जागरण वाले मनोज श्रीवास्तव, नवजीवन वाले मनोज श्रीवास्तव, करंट वीकली वाले मनोज श्रीवास्तव आदि आदि.
आदरणीय मनोज श्रीवास्तव को लखनऊ बहुत पसंद था.
अमर उजाला प्रबंधन भी उन्हें लखनऊ में ही रखना चाहता था लेकिन मनोज श्रीवास्तव चाहते थे, वाराणसी जाना अपने परिवार के रोज हँसने बोलने के लिए.
मनोज श्रीवास्तव ने बार बार आग्रह किया तो अमर उजाला प्रबंधन ने उनका आग्रह स्वीकार लिया. उन्हें वाराणसी भेज दिया.
वाराणसी में आवास से निकलते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह अंतिम यात्रा पर चले गए.
तीस मई यानि हिन्दी पत्रकारिता दिवस बहुत करीब आ गया है. इसलिए सोचा कि जयप्रकाश शाही और मनोज श्रीवास्तव की भी याद दिला दूँ.


