हर खास इंसान पहले आम इंसान होता है
✍️ शालिनी सिन्हा…
कहा जाता है कि हर खास इंसान कभी आम इंसान ही होता है। लेकिन आम इंसान के लिए कुछ भी “आम” नहीं होता।
आम इंसान के हिस्से में परेशानियाँ और असुविधाएँ पहले से तय रहती हैं। अगर आप आम हैं, तो मंदिरों से लेकर अस्पतालों तक लंबी कतारें आपका इंतज़ार करती हैं। ट्रेन की वेटिंग लिस्ट, बसों और जीपों की धक्का-मुक्की—सब कुछ आपके लिए ही है। आप आम हैं, इसलिए भीड़ में शोर मचाने वालों का एक नगण्य अंश भी आप ही हैं। राजनेताओं और फिल्मी सितारों के झंडे ढोने वाले भी आप ही हैं।
आपको कब रौंद दिया जाएगा, कब बेवजह फँसा दिया जाएगा और कब बिना जुर्म के सज़ा दे दी जाएगी—आपको पता भी नहीं चलेगा। आम इंसान को इंसाफ और न्याय भी आम तौर-तरीकों से नहीं मिलता। मन्नू भंडारी का उपन्यास महाभोज आम इंसान की इसी विवशता, पीड़ा और “आम होने के अभिशाप” को गहराई से उजागर करता है। यह भी दिखाता है कि कैसे खास लोग आम इंसानों को बलि का बकरा बना देते हैं।
इस पृथ्वी पर इंसानों की दो श्रेणियाँ बना दी गई हैं—आम और खास। आम लोगों की भीड़ में कुछ ही लोग खास बन पाते हैं। खास लोगों के लिए हर जगह खास व्यवस्थाएँ होती हैं—मंदिरों में विशेष दर्शन, अस्पतालों में विशेष इलाज, बसों और ट्रेनों में स्पेशल बोगियाँ, हवाई यात्रा में विशेष टिकट और हर जगह विशेष व्यवहार।
जरा सोचिए, आप अगर आम इंसान बनकर किसी सरकारी दफ्तर में घुस जाएँ, तो क्या आपको विशेष व्यवहार मिलेगा? नहीं। लेकिन अगर आप रौब, रसूख या “भौकाल” के साथ जाएँ, तो अफसर से लेकर नेता तक आपके आगे-पीछे घूमते नज़र आएँगे। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो हर जगह आम इंसान की हैसियत बेहद सीमित है। खास इंसान को न केवल सुविधाएँ मिलती हैं, बल्कि सम्मान और कभी-कभी पूजा तक मिल जाती है—चाहे वह वास्तव में पूजनीय हो या नहीं।
एक बार मेरे मन में यह विचार आया कि आम और खास इंसान के बीच के फर्क को स्वयं महसूस किया जाए। इसलिए मैंने निश्चय किया कि एक आम इंसान बनकर अपने ज़िले के जिलाधिकारी से मिलूँ। उस समय हमारे ज़िले के डीएम श्री मुकुल कुमार गुप्ता थे।

पहले दिन मैं अपने बच्चों के साथ कलेक्ट्रेट पहुँची। सोचा था कि डीएम उच्च शिक्षित, संवेदनशील और सभ्य होंगे, शायद तुरंत मुलाकात हो जाएगी। लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद पता चला कि वे दफ्तर में ही नहीं हैं। दूसरे दिन भी यही हुआ—वे मीटिंग में व्यस्त थे, जिसका कोई समय निर्धारित नहीं था। तीसरे दिन मैंने ठान लिया कि आज बिना मिले वापस नहीं जाऊँगी।
लगातार चक्कर लगाने से दफ्तर के कर्मचारी मुझे पहचानने लगे थे और सहानुभूति भी दिखाने लगे। अंततः किसी ने डीएम तक यह सूचना पहुँचा दी कि एक महिला कई दिनों से मिलने की कोशिश कर रही है। तब शाम को मुझे अंदर बुलाया गया। मैंने अपनी किताब उन्हें देते हुए उसके विमोचन का प्रस्ताव रखा। उनका उत्तर इतना कूटनीतिक था कि मैं हाँ और ना के बीच कुछ भी समझ नहीं पाई।
कुछ सप्ताह बाद जब मैं दोबारा स्पष्ट उत्तर जानने पहुँची, तो जनता दरबार के दौरान उन्होंने भरी सभा में ही कह दिया—
“मैंने तो आपको मना कर दिया था, आप यहाँ से जाइए।”
मेरे साथ मेरी बेटी थी, जिसे कुछ समय पहले ही मैंने जिलाधिकारी के पद की गरिमा समझाई थी। उस क्षण चुप रह जाना ही मुझे बेहतर लगा।
इसके बाद मैंने निश्चय किया कि अब मैं “खास” बनकर देखूँगी। चार महीने की मेहनत से मैंने दूसरी किताब लिखी। तब तक पुराने डीएम का तबादला हो चुका था और नए डीएम पदस्थ हो गए थे।
जब मैं नए जिलाधिकारी से मिलने पहुँची, तो माहौल बदला हुआ था। मैंने पर्ची पर अपना नाम लिखते हुए परिचय में “पत्रकार एवं लेखिका” लिखा। भीतर से तुरंत बुलावा आ गया। कलेक्टर साहब ने स्वयं कुर्सी ऑफर की, सम्मानपूर्वक बात की और मेरे प्रस्ताव को सहजता से स्वीकार कर लिया।
संभव है यह व्यक्ति-विशेष का फर्क हो, लेकिन इतना तो स्पष्ट हो गया कि खास होने या किसी खास पद पर होने से हर जगह सम्मान और प्रतिष्ठा अपने आप जुड़ जाती है। आम इंसान हर जगह पिसता है।
मेरा आशय यह नहीं है कि खास लोगों को विशेष सुविधाएँ न मिलें, बल्कि केवल इतना है कि आम इंसान इतना भी न पिसे कि उसका हक ही उससे छिन जाए। अधिकारी या उच्च पद पर होने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि आम नागरिक की गरिमा को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए।
खास इंसान भी इसलिए खास है क्योंकि वह किसी खास पद पर है या फिर आम लोगों ने मिलकर उसे खास बना दिया है। आम और खास की यह लड़ाई हर जगह है। कोई आम होकर खास बनना चाहता है, तो कोई खास होकर भी आम होने का दावा करता है।
अच्छा इलाज, अच्छी शिक्षा और अच्छा व्यवहार केवल खास लोगों तक सीमित न रहे—आम इंसान भी उतना ही इसका हकदार है।
क्योंकि हर खास इंसान पहले आम ही होता है।
संक्षिप्त परिचय
शालिनी सिन्हा
विश्व रिकॉर्ड ( सबसे अधिक विविध साहित्यिक एवं पत्रकारिता रूपों वाली सबसे कम उम्र की महिला लेखिका – Youngest Female Writer with Most Diverse Literary and Journalistic Forms)
राष्ट्रीय रिकार्ड ( Most Prolific author in multiple catagories)
पूर्व अनुसंधान सहायिका
(केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान,लखनऊ)
गेस्ट फैकल्टी
(एज़ाज़ रिज़्वी कॉलेज ऑफ जॉर्नलिज्म)
स्थानीय संपादक
(नॉर्थ इंडिया टाइम्स)
प्रबंध अधिकारी
(शहरी खेती एवम निरंतरता संस्थान)
मुक्त लेखिका एवम ऑथर

