संदेश…

शब्द मेरे मीत…
डाक्टर महिमा सिंह
बैठी थी रोजमर्रा
की कशमश में,
तभी आया एक संदेश
जो लाया मीठी हवा का झोका ,
लहरा गयी यादें खींच गया
जाने कितनी ही पुरानी
यादों का खाका।
मन था मिलने को आतुर, आयी है सखी समंदर की नगरी में,
लायी है संग साथ
मेरे अपने शहर लखनऊ
की खुश्बू ।
मन हो रहा
था बेकरार ,
फिर आया
दूरभाष हुयी बात जिससे दूरी मानो कम सी लगने लगी।
फिर तय कार्यक्रम पर
हम जा पहुंचे मिलने सखी रोली से प्रदर्शनीस्थल।
दूरियां मिटी मिले गले हम।
रह गयी वो ! कुछ आवाक सी जो देखा मेरा अक्स हुबहू मेरे साथ । बोली
अनायास पहले जाकर घर देना नजर उतार इतनी प्यारी बिटिया रानी की । कालेज की दोस्ती यारी को मत गिनो अब गिले -शिकवे
में यारो। बस जब भी पल ये अनूठा हाथ आए मिलो गले तपाक से। बातें लंबी घड़ियां छोटी पड़ गई।
आया याद झट खींची
फोटो औरों को जलाना भी था, हंसाना भी था 🥰
बीती घड़ियां जाने कब ।
आयी बारी विदा की
हुई बाय बाय।
सहेज कर महिमा
लायी धानी सी यादें
संग- साथ । फिर मिलेंगे
ये वादा रहा ऐ दोस्त।
तुम भी खुश रहना बगिया मे अपनी । खिलो जचो सजो तुम अपने
प्रकाश के माथे की रोरी
बन कर रोली ।
प्रकाश भरे इन्द्रधनुषी रंग
तेरे जीवन मे अनवरत हो प्रकाश का साथ हर क्षण
महिमा की यही शुभकामना

