डा. अर्चना शर्मा! इस धारणा को बदलिए और एक डॉक्टर को समझने की कोशिश करिए

वायरल पोस्ट…
फ़ेसबुक, वाट्स एप पर तेजी वायरल हो रहा यह पोस्ट मुख्यतः देश के चिकित्सकों द्वारा अपने अपने पेज पर लगाया जा रहा है। जिसे वे नॉन मेडिको फ्रेंड्स के लिए लगा रहे हैं हैं जो उनसे जुड़े हुए हैं। यह पोस्ट उस डॉक्टर के लिए है जिसने अपनी सारी ऊर्जा लगाने के बाद भी एक मरीज को नहीं बचा सकी और जनता प्रशासन स्थानीय नेताओं की शिकार होने के बाद अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए खुद ब खुद आत्महत्या करना उचित समझा। ताकि लोग समझ सके कि उसने वह सारी कोशिश की जिससे मरीज को बचाया जा सकता था। लेकिन कुछ ऐसे जटिल केस में ऐसी घटनाएं आम बात है, वायरल पोस्ट लिखने वाले की जुबानी, …ऐसे केस में चिकित्सक का कोई दोष नहीं होता है। घटना राजस्थान के दौसा जिले के लालसोट कस्बे की है, डॉ अर्चना मैम गोल्ड मेडलिस्ट थीं इससे पहले गांधी नगर में गायनी ओब्स की हेड ऑफ डिपार्टमेंट थी कई पुरस्कारों और पब्लिकेशन की मालिक थीं उनके पति भी मनोचिकित्सक हैं, फिर लालसोट जैसे कस्बे में आती हैं यहां हॉस्पिटल से काम करती हैं और क्षेत्र वालों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं, फिर एक दिन एक केस आता है एक डिलीवरी का उस केस को डॉक्टर अर्चना मैम मैनेज करती हैं, दुर्भाग्य से वो मरीज नहीं रहता पी पी एच (पोस्टपार्टम हैम्रेज) #डिलीवरीकेबादहोनेवालीब्लीडिंग, की वजह से, यहां मैं नहीं लिख रहा की मैम ने एक डॉक्टर के नाते कैसे मैनेज करने की कोशिश की होगी, डिलीवरी के बाद अन्य जटिलताओं को तरह पी पी एच भी एक जटिलता है जिसमे डॉक्टर को कटघरे में खड़ा करने से पहले सोचने की जरूरत है ,पी पी एच दो प्रकार का होता है प्राइमरी यानि डिलीवरी के बाद24घंटे तक जिसमे पहला घंटा बहुत महत्पूर्ण होता है &दूसरा सेकेंडरी 24 घंटे के बाद 12 सप्ताह तक, डिलीवरी के बाद 500 ml तक ब्लीडिंग नॉर्मल डिलीवरी में होती है और सी सेक्शन में 1000 ml तक होती है इसके ऊपर फिर पीपीएच की श्रेणी में आता है, पीपीएच होने के मुख्य कारण है1-एटोनिक यूट्रस(80%)_डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग होना आम बात है क्योंकि गर्भाशय प्लेसेंटा को बाहर निकालने के लिए कोट्रैक्ट होता है पर कुछ केस में यूट्रस सिकुड़ना बंद कर देता है जिससे ब्लड वेसल्स में ब्लीडिंग बढ़ जाती है और इसे यूट्रस एटोनी कहते हैं जिसे हेमरेज हो सकता है और यह प्राइमरी पीपीएच का एक सामान्यता कारण हो सकता है, कभी-कभी प्लेसेंटा के छोटे टुकड़े यूट्रस में रह जाते हैं उससे ब्लीडिंग और बढ़ जाती है इसको सेकेंडरी पीपीएच की श्रेणी में रखते हैं

एटोनिक यूट्रस के अन्य कारण जैसे बिग बेबी हो,ट्विंस हो,या पॉलीहाइड्रोमेनोज हो या कोई इंफेक्शन हो या प्रोलांग लेबर हो या 2-यूट्रस, सर्वाइकल,या वेजिनल इंजरी हो 3-या ब्लड रिलेटेड कोई डिसऑर्डर हो 4-या कुछ भाग अंदर यूट्रस में रह जाए जैसा कि पहले बताया गया,एवम बी पी अनियमितता के साथ कई ऐसे रिस्क फैक्टर्स हैं जो यहां सब लिखना संभव नहीं है अब बात को समझिए ,मरीज के परिजनों ने हंगामा किया धरने के साथ पुलिस प्रशासन का राजनीतिक संरक्षण नकारा नहीं जा सकता ,पुलिस द्वारा हत्या का मुकदमा दर्ज कर दिया डॉक्टर अर्चना मैम के ऊपर और उनके पति के ऊपर जो वहीं कशबे में मनोचिकत्सक हैं इससे आहत होकर मैम ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली , मैम दो बच्चों की मां भी थीं एक हंसता खेलता परिवार बर्बाद हो गया 😢😢😢पता है क्यों यहां डॉक्टर को भगवान तभी तक मानते हैं अगर मरीज सही है तभी तक अगर दुर्भाग्यवश मरीज सही नहीं हो पाता डॉक्टर की भरसक कोशिश के बाद तो वही डॉक्टर शैतान हो जाता है इस धारणा को बदलिए और एक डॉक्टर को समझने की कोशिश भी करिए डॉक्टर भी एक इंसान है उसका भी परिवार है ऐसी कंडीशन आएगी कि तो फिर सीरियस मरीज को डॉक्टर लेने की कोशिश ही नहीं करेगा, सीएचसी पीएचसी का तो यह हाल है अगर जरा सा भी कोई इमरजेंसी केस आता है तो इलाज करने के साथ 1 लोग बगल में रिफर बना रहे होते हैं जिला अस्पताल या हायर सेंटर के लिए क्यों की वो भुक्तभोगी होते हैं चीजों के, ताली थाली बजाकर डॉक्टर को समझिए भी , कोविड कालचक्र के दौरान तस्वीरें अभी भी जेहन में हैं स्वास्थ्य कर्मियों के साथ अटैक हो रहा था तो भी डेढ़ साल तक डॉक्टर या अन्य स्वास्थकर्मी घर नहीं गए इंफेक्ट होते हुए ड्यूटी की, और अनगिनत डॉक्टर ने अपनी जान गवाई ,यही हाल रहा तो फिर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने से पहले सोचेगा…
प्रभु राम अपने श्री चरणों में डा. अर्चना शर्मा को स्थान दें ओम शांति

